सोशल मीडिया पर बच्चों की सुरक्षा के लिए सरकार सख्त: आपत्तिजनक कंटेंट हटाने के नए नियम लागू, एआई और डीपफेक पर भी कड़ी निगरानी

केंद्र सरकार ने इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए ऑनलाइन सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक सख्त बनाने की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री, अश्लील कंटेंट और अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों को तेजी से रोका जा सके। इसके लिए सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारियों को और स्पष्ट किया गया है तथा आपत्तिजनक सामग्री हटाने की समयसीमा को पहले की तुलना में काफी कम कर दिया गया है। साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई और डीपफेक तकनीक के बढ़ते उपयोग को देखते हुए नए सुरक्षा प्रावधान भी लागू किए गए हैं।
सरकार ने बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़े मामलों को बेहद गंभीर मानते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित ऐसे विज्ञापनों और कंटेंट की जानकारी मांगी है, जिनसे बच्चों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। संबंधित प्लेटफॉर्म से विस्तृत रिपोर्ट तलब की गई है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ऐसी सामग्री किस प्रकार प्लेटफॉर्म तक पहुंची और उसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए। बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े संस्थानों ने भी इस विषय पर आवश्यक कार्रवाई शुरू कर दी है, जिससे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और बढ़ गई है।
डिजिटल माध्यमों पर होने वाले साइबर अपराधों से निपटने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत पहले से ही कड़े कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। पहचान की चोरी, ऑनलाइन प्रतिरूपण, निजता का उल्लंघन, अश्लील सामग्री का प्रसारण और बच्चों से संबंधित यौन शोषण सामग्री के प्रकाशन जैसे अपराधों के लिए सख्त दंड निर्धारित किए गए हैं। कानून प्रवर्तन एजेंसियों को ऐसे मामलों की जांच और आवश्यक कार्रवाई करने के पर्याप्त अधिकार भी दिए गए हैं, ताकि दोषियों के खिलाफ प्रभावी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियमावली, 2021 के तहत सोशल मीडिया कंपनियों और अन्य डिजिटल मध्यस्थों की जिम्मेदारियों को भी और स्पष्ट किया है। अब इन प्लेटफॉर्म को अपने यहां उपलब्ध ऐसी किसी भी सामग्री की पहचान कर उसे हटाना होगा, जो बच्चों के लिए हानिकारक हो, अश्लील हो, यौन शोषण से जुड़ी हो, किसी व्यक्ति की निजता का उल्लंघन करती हो या कानून के विरुद्ध हो। कंपनियों को ऐसी सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए प्रभावी तकनीकी तंत्र विकसित करना भी अनिवार्य किया गया है।
नई व्यवस्था के अनुसार यदि किसी व्यक्ति या उसके अधिकृत प्रतिनिधि की ओर से निजी तस्वीरों, मॉर्फ की गई छवियों, नग्नता या अन्य संवेदनशील सामग्री से संबंधित शिकायत प्राप्त होती है, तो संबंधित प्लेटफॉर्म को दो घंटे के भीतर उस सामग्री को हटाने या उसकी पहुंच रोकने के लिए आवश्यक कार्रवाई करनी होगी। इससे पीड़ित व्यक्तियों को त्वरित राहत मिलने की उम्मीद है और आपत्तिजनक सामग्री के वायरल होने की संभावना भी कम होगी।
सरकार ने गैर-कानूनी कंटेंट हटाने की समयसीमा में भी बड़ा बदलाव किया है। अब अदालत या सक्षम सरकारी प्राधिकरण के आदेश मिलने के बाद सोशल मीडिया कंपनियों को केवल तीन घंटे के भीतर संबंधित सामग्री हटानी होगी। पहले इसके लिए 36 घंटे का समय निर्धारित था। इसी प्रकार शिकायत निवारण की प्रक्रिया को भी अधिक प्रभावी बनाया गया है, जहां संवेदनशील मामलों में दो घंटे और अन्य मामलों में 36 घंटे के भीतर कार्रवाई सुनिश्चित करने का प्रावधान किया गया है।
एआई और डीपफेक तकनीक के बढ़ते उपयोग को देखते हुए सरकार ने इनसे जुड़े नियमों को भी मजबूत किया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को अब एआई से तैयार की गई सामग्री पर स्पष्ट पहचान चिह्न लगाने, उसके स्रोत से जुड़े ट्रेस किए जा सकने वाले मेटाडेटा सुरक्षित रखने और गैर-कानूनी एआई सामग्री की पहचान के लिए आधुनिक तकनीकी प्रणालियां विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई है। इन नियमों के दायरे में बाल यौन शोषण सामग्री, बिना सहमति साझा की गई अंतरंग तस्वीरें, प्रतिरूपण और अन्य हानिकारक डीपफेक सामग्री भी शामिल की गई है।
सरकार ने बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को स्वचालित तकनीकी उपकरण अपनाने के निर्देश भी दिए हैं, जो पहले हटाई जा चुकी गैर-कानूनी सामग्री की दोबारा पहचान कर उसे पुनः अपलोड होने से रोक सकें। इसके अलावा प्रमुख मैसेजिंग प्लेटफॉर्म को गंभीर अपराधों की जांच के दौरान कानून के अनुरूप किसी संदेश के प्रथम प्रेषक की पहचान करने में सक्षम होना होगा। यह व्यवस्था राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और बच्चों के खिलाफ गंभीर अपराधों की जांच को अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से लागू की जा रही है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई सोशल मीडिया कंपनी या डिजिटल मध्यस्थ इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो उसे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा का लाभ नहीं मिलेगा। ऐसे मामलों में संबंधित प्लेटफॉर्म के खिलाफ लागू कानूनों के अनुसार कार्रवाई की जा सकेगी। साथ ही विभिन्न चरणों में एडवाइजरी और मानक संचालन प्रक्रियाएं भी जारी की गई हैं, ताकि सोशल मीडिया कंपनियां अपनी आंतरिक निगरानी प्रणाली को और मजबूत बनाएं तथा उपयोगकर्ताओं, विशेष रूप से बच्चों और महिलाओं, के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण सुनिश्चित कर सकें।
