अल नीनो का मानसून पर बड़ा असर, 1950 के बाद 16 में से 7 बार घटी बारिश, सरकार ने संसद में दी अहम जानकारी

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भारत में मानसून की स्थिति और अल नीनो के प्रभाव को लेकर संसद में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की गई है। केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि वर्ष 1950 के बाद से अब तक 16 बार अल नीनो की स्थिति बनी है। इनमें से सात अवसर ऐसे रहे जब भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून पर इसका स्पष्ट असर देखने को मिला और देश में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हर बार अल नीनो का प्रभाव एक जैसा नहीं होता, क्योंकि इसकी तीव्रता और अन्य वैश्विक मौसमीय परिस्थितियां भी मानसून को प्रभावित करती हैं।

सरकार के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में अल नीनो के दौरान भारतीय दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ने की संभावना अधिक रहती है। खासतौर पर मानसून के शुरुआती महीनों में इसका असर अधिक दिखाई देता है। वहीं मौसम वैज्ञानिकों के विश्लेषण में यह भी सामने आया है कि मानसून के अंतिम चरण, विशेषकर सितंबर महीने की वर्षा के दौरान अल नीनो और बारिश के बीच एक मजबूत विपरीत संबंध देखा गया है। इसका अर्थ है कि कई बार शुरुआती कमजोरी के बाद मौसम में बदलाव भी देखने को मिल सकता है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग ने वर्ष 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए सामान्य से कम बारिश का पूर्वानुमान जारी किया था। अप्रैल 2026 में जारी पहले दीर्घकालिक अनुमान में पूरे सीजन की वर्षा को लॉन्ग पीरियड एवरेज यानी एलपीए का 92 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई थी। बाद में मौसम संबंधी नवीनतम आंकड़ों और वैज्ञानिक मॉडल के आधार पर दूसरे चरण के पूर्वानुमान में इसे संशोधित कर 90 प्रतिशत एलपीए कर दिया गया। यह संकेत था कि इस वर्ष मानसून सामान्य से कुछ कमजोर रह सकता है।

मौसम विभाग ने अपने पूर्वानुमानों में अल नीनो की संभावित स्थिति के बारे में पहले ही संकेत देना शुरू कर दिया था ताकि किसान, जल संसाधन विभाग, आपदा प्रबंधन एजेंसियां और अन्य संबंधित संस्थाएं समय रहते अपनी तैयारियां कर सकें। मौसम विभाग नियमित रूप से दैनिक वर्षा की जानकारी, मासिक जलवायु अपडेट और अल नीनो की स्थिति पर निगरानी रखता है। इसके अलावा जिला और ब्लॉक स्तर तक वर्षा से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई जाती है ताकि स्थानीय स्तर पर भी बेहतर योजना बनाई जा सके।

कृषि क्षेत्र को मौसम संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने के लिए मौसम विभाग हर सप्ताह पिछली वर्षा का विश्लेषण और अगले दो सप्ताह की संभावित वर्षा का पूर्वानुमान भी साझा करता है। इससे किसानों को फसल प्रबंधन, बुआई और सिंचाई संबंधी निर्णय लेने में सहायता मिलती है। साथ ही मौसम वैज्ञानिक कृषि और जल प्रबंधन से जुड़े विभागों के साथ मिलकर यह भी अध्ययन कर रहे हैं कि अल नीनो और वर्षा में बदलाव का खेती तथा जलाशयों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।

सरकार ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2026 में अल नीनो के संभावित प्रभाव को लेकर राज्यों के लिए अलग से जिला-वार जोखिम आकलन या विशेष दिशा-निर्देश जारी नहीं किए गए हैं। हालांकि मौसम विभाग लगातार लू, भारी वर्षा, कम वर्षा और अन्य चरम मौसम घटनाओं को लेकर समय-समय पर शुरुआती चेतावनी जारी करता है। इन सूचनाओं को सभी संबंधित मंत्रालयों, राज्य सरकारों और विभिन्न एजेंसियों तक पहुंचाया जाता है ताकि समय रहते आवश्यक कदम उठाए जा सकें।

विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम की बदलती परिस्थितियों और जलवायु परिवर्तन के दौर में सटीक पूर्वानुमान, समय पर चेतावनी और वैज्ञानिक जानकारी ही कृषि, जल प्रबंधन और आपदा जोखिम को कम करने का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकती है। ऐसे में अल नीनो की लगातार निगरानी और मानसून के पूर्वानुमानों का महत्व आने वाले वर्षों में और भी बढ़ने की संभावना है।

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