कोर्टरूम ड्रामा से भर चुका सिनेमा, ‘जॉली एलएलबी 3’ को लेकर क्यों ठंडी है दर्शकों की उत्सुकता?

पिछले पाँच वर्षों में बॉलीवुड से लेकर ओटीटी प्लेटफॉर्म तक कोर्टरूम ड्रामा की झड़ी सी लग गई है। चाहे बड़े सितारों की फिल्में हों या वेब सीरीज़—न्यायालय की बहसें और वकीलों की दलीलें लगातार दर्शकों तक परोसी जाती रही हैं। नतीजा यह है कि अब दर्शक इस जॉनर से कुछ हद तक ओवर-एक्सपोज़ महसूस करने लगे हैं।
ऐसे माहौल में जब ‘जॉली एलएलबी 3’ की चर्चा शुरू हुई तो उत्साह उम्मीद के मुताबिक़ नहीं दिखा। जबकि अर्जुन पाठक से लेकर मेड इन हेवन जैसी कहानियाँ पहले ही कोर्टरूम और सामाजिक बहसों पर प्रकाश डाल चुकी हैं।
‘जॉली एलएलबी’ सीरीज़ की खासियत
पहली दो फिल्मों ने व्यंग्य और गंभीर मुद्दों को बेहद हल्के-फुल्के लेकिन असरदार अंदाज़ में पेश किया था। अरशद वारसी और अक्षय कुमार जैसे सितारों ने किरदारों को जीवंत बना दिया था। यही कारण है कि इस सीरीज़ को दर्शकों का भरपूर प्यार मिला। लेकिन अब तीसरे भाग के सामने चुनौती है कि वह पहले जैसी ताजगी और धार कैसे बनाए।
दर्शकों की उम्मीदें और चुनौती
आज के दर्शक यथार्थपरक और नए प्रयोगों वाली कहानियों की तलाश में रहते हैं। अगर फिल्म सिर्फ कोर्टरूम डायलॉग और बहस तक सीमित रह गई, तो यह उन्हें दोहराव जैसी लगेगी। इसलिए ‘जॉली एलएलबी 3’ के निर्माताओं के लिए ज़रूरी होगा कि वे कहानी में नया ट्विस्ट, सामाजिक मुद्दों की प्रासंगिकता और सिनेमा का मज़ा—all three—एक साथ परोसें।
