बीमा नहीं तो पेट्रोल-डीजल नहीं? बिना थर्ड पार्टी इंश्योरेंस वाले वाहनों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त,

देश में सड़क सुरक्षा को मजबूत बनाने और बिना बीमा वाले वाहनों पर लगाम लगाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कदम उठाया है। अदालत ने उन लाखों वाहनों पर गंभीर चिंता जताई है जो वैध थर्ड पार्टी बीमा के बिना सड़कों पर चल रहे हैं। कोर्ट का मानना है कि ऐसे वाहन न केवल कानून का उल्लंघन करते हैं बल्कि सड़क दुर्घटनाओं की स्थिति में पीड़ितों के लिए मुआवजा प्राप्त करना भी मुश्किल बना देते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक पायलट प्रोजेक्ट तैयार करने का निर्देश दिया है, जिसके तहत बिना वैध थर्ड पार्टी बीमा वाले वाहनों को पेट्रोल और डीजल उपलब्ध कराने पर रोक लगाने की संभावनाओं का परीक्षण किया जाएगा।
अदालत ने कहा कि मोटर वाहन कानून के तहत थर्ड पार्टी बीमा हर वाहन के लिए अनिवार्य है, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में वाहन बिना बीमा के सड़कों पर दौड़ रहे हैं। यह स्थिति सड़क सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। यदि किसी दुर्घटना में ऐसा वाहन शामिल होता है तो पीड़ित को मुआवजा मिलने की प्रक्रिया जटिल हो जाती है और कई बार उसे लंबे समय तक न्याय का इंतजार करना पड़ता है।
इसी समस्या के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आधुनिक तकनीक के उपयोग के साथ एक ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर विचार करने को कहा है, जिसके माध्यम से पेट्रोल पंपों पर वाहन का बीमा रिकॉर्ड सत्यापित किया जा सके। यदि किसी वाहन का थर्ड पार्टी बीमा समाप्त हो चुका हो या वह वैध न हो, तो उसे ईंधन देने से पहले आवश्यक नियमों का पालन सुनिश्चित किया जा सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल इसे सीधे देशभर में लागू करने के बजाय पहले चुनिंदा क्षेत्रों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया जाए, ताकि इसकी व्यवहारिकता और प्रभाव का मूल्यांकन किया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं और टोल प्लाजा पर लगने वाली लंबी कतारों को भी गंभीर मुद्दा माना। अदालत का कहना है कि टोल प्लाजा पर वाहनों के रुकने से न केवल समय की बर्बादी होती है बल्कि यातायात प्रभावित होने के साथ दुर्घटनाओं की आशंका भी बढ़ जाती है। इस समस्या को दूर करने के लिए अदालत ने केंद्र सरकार को ऐसे पायलट कॉरिडोर विकसित करने का निर्देश दिया है, जहां वाहनों की पहचान स्वचालित तकनीक के माध्यम से की जा सके और उन्हें बिना रुके टोल से गुजरने की सुविधा मिले।
कोर्ट का मानना है कि डिजिटल तकनीक और स्वचालित पहचान प्रणाली के इस्तेमाल से यातायात अधिक सुगम होगा, टोल प्लाजा पर भीड़ कम होगी और सड़क परिवहन व्यवस्था अधिक सुरक्षित एवं प्रभावी बन सकेगी। साथ ही, इससे वाहन संबंधी दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया भी तेज और पारदर्शी हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में बिना थर्ड पार्टी बीमा वाले वाहनों को ईंधन नहीं देने जैसी व्यवस्था लागू होती है, तो वाहन मालिक समय पर अपना बीमा नवीनीकरण कराने के लिए अधिक जागरूक होंगे। इससे कानून का पालन बढ़ेगा, सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में पीड़ितों को उचित सुरक्षा मिलेगी और वाहन बीमा का दायरा भी व्यापक होगा।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को पायलट परियोजना की रूपरेखा तैयार करने और तकनीकी तथा प्रशासनिक पहलुओं का अध्ययन करने के निर्देश दिए हैं। इस परियोजना के परिणामों के आधार पर भविष्य में देशभर में नई व्यवस्था लागू करने पर निर्णय लिया जा सकता है। यदि यह योजना सफल रहती है तो यह सड़क सुरक्षा, यातायात प्रबंधन और वाहन बीमा अनुपालन के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकती है।
