युवाओं में बढ़ते हाइपोथाइरॉएडिज्म के लिए विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध

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युवाओं में हाइपोथाइरॉएडिज्म रोग को जल्द से जल्द डायग्नोज करने एवं उपचारित करने के लिए, आयुष मंत्रालय भारत सरकार और शासकीय होम्योपैथी चिकित्सा महाविद्यालय भोपाल ने, संयुक्त रूप से महाविद्यालय परिसर में एक विशेषज्ञ इकाई की स्थापना की है, इसमें हाइपोथाइरॉएडिज्म के मरीजों का उपचार किया जा रहा है।

यहां होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति योग आहार चिकित्सा और प्राकृतिक पद्धतियों से व्यक्ति का संपूर्ण उपचार प्रदान किया जा रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में रोगी लाभान्वित हो रहे हैं। इस उपचार के पूर्व रोगी का बॉडी कंपोजिशन एनालिसिस किया जाता है ताकि दिए जाने वाले उपचार को व्यक्ति विशेष के लिए संधारित किया जा सके। उक्त उपचार का लाभ पूर्व पंजीयन के माध्यम से शासकीय होम्योपैथी चिकित्सा महाविद्यालय में किया जाता है। इसके लिए दूरभाष क्रमांक 0755-2992970 पर शासकीय कार्य दिवसों में प्रातः 10 से सायं 5 बजे तक पंजीयन सुविधा उपलब्ध है। पंजीयन के पश्चात, सभी को अपने पूर्व की जांचों को लेकर आना अनिवार्य है और यथासंभव आवंटित दिवस पर उपलब्ध होना होगा ताकि अन्य रोगियों की व्यवस्था में किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न ना हो।

वर्तमान समय में जीवन शैली आहार और वातावरण के प्रभाव से युवा वर्ग में, हाइपोथाइरॉएडिज्म या अल्प सक्रिय थायराइड नामक रोग बड़ी संख्या में देखने को मिल रहा है। प्रायः यह रोग शरीर के वजन को बढ़ाता है और क्रियाशीलता पर प्रभाव डालता है। यदि यह बहुत कम आयु में हो जाता है तो बालक के विकास पर बहुत प्रभाव पड़ता है। युवाओं में विशेषकर, स्त्रियों में यह अनियमित माहवारी के रूप में शुरू होता है, इस कारण शरीर के रासायनिक असंतुलन से अन्य कई समस्याएं जैसे डायबिटीज, ओबेसिटी, जोड़ों में दर्द आदि भविष्य में उत्पन्न होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है।

मुख्य कार्यपालन अधिकारी एवं प्राचार्य डॉ एस के मिश्रा ने बताया कि इस प्रकार की गंभीर समस्या को अल्पायु में उपचारित करने से लोगों के जीवन की क्वालिटी को बढ़ाया जा सकता है और यथासंभव रासायनिक उत्पादों से उनकी सुरक्षा की जा सकती है। इस उपचार के दौरान पूर्व से ली जा रही किसी भी दवा को बंद नहीं किया जाता है अपितु हमारे विशेषज्ञ के अनुरूप रोगी की आवश्यकता अनुसार अतिरिक्त उपचार प्रदान किया जाता है।

कार्यक्रम प्रमुख एवं नोडल अधिकारी डॉ जूही गुप्ता ने बताया कि यह परिवर्तन बच्चों में कम आयु से दिखाई देने लगे हैं और 18 वर्ष की आयु आते-आते यह स्पष्ट रोग का स्वरूप लेते दिखाई दे रहे हैं।

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