26 दिन के अनशन के बाद राजघाट पहुंचे सोनम वांगचुक, युवाओं से बोले- बापू का रास्ता आज भी सबसे प्रासंगिक

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26 दिनों तक चले आमरण अनशन और अस्पताल में उपचार के बाद सामाजिक कार्यकर्ता एवं शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक ने सोमवार को अपनी पहली सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज कराई। अस्पताल से छुट्टी मिलने के तुरंत बाद वे सीधे नई दिल्ली स्थित राजघाट पहुंचे, जहां उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की। राजघाट पहुंचकर उन्होंने गांधीजी के विचारों को नमन किया और देश के युवाओं से शांति, संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों के रास्ते पर आगे बढ़ने का संदेश दिया।

राजघाट पर श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद सोनम वांगचुक ने कहा कि आज के समय में भी महात्मा गांधी के सिद्धांत उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में थे। उन्होंने कहा कि समाज और देश से जुड़े बड़े मुद्दों का समाधान संवाद, अहिंसा और शांतिपूर्ण जनभागीदारी के माध्यम से ही संभव है। उनके अनुसार लोकतंत्र तभी मजबूत बनता है, जब सरकारें जनता की आवाज को गंभीरता से सुनें और नागरिक भी अपनी बात शांतिपूर्ण तरीके से रखें।

वांगचुक ने युवाओं को देश की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि परिवर्तन की शुरुआत हमेशा जागरूक नागरिकों से होती है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे केवल विरोध तक सीमित न रहें, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभाएं। उन्होंने विश्वास जताया कि यदि नई पीढ़ी गांधीजी के सत्य, अहिंसा और संवेदनशील नेतृत्व के मूल्यों को अपनाएगी तो देश अधिक मजबूत और जिम्मेदार लोकतंत्र के रूप में आगे बढ़ेगा।

उन्होंने यह भी बताया कि अस्पताल से निकलने के बाद राजघाट जाना उनके लिए केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह उनकी व्यक्तिगत आस्था और विचारधारा का हिस्सा था। उन्होंने कहा कि जिस तरह अपने आंदोलन की शुरुआत से पहले उन्होंने महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की थी, उसी तरह इस यात्रा के समापन पर भी उन्होंने बापू को नमन करना उचित समझा। इसके बाद उन्होंने अपने गृह क्षेत्र लद्दाख लौटने की योजना की जानकारी भी साझा की।

सोनम वांगचुक ने अस्पताल में उपचार के दौरान सहयोग देने वाले डॉक्टरों, चिकित्सा कर्मचारियों और उन सभी लोगों का भी आभार व्यक्त किया जिन्होंने कठिन समय में उनका साथ दिया। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य में अब काफी सुधार है और वे जल्द ही सामान्य जीवन में लौटकर अपने सामाजिक और पर्यावरणीय कार्यों को आगे बढ़ाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में संवाद और आपसी विश्वास सबसे महत्वपूर्ण होते हैं तथा इन्हीं मूल्यों के आधार पर आगे का रास्ता तैयार किया जाना चाहिए।

राजघाट पर उनकी मौजूदगी के दौरान बड़ी संख्या में समर्थक और शुभचिंतक भी पहुंचे। कई लोगों ने उनके स्वास्थ्य लाभ पर खुशी जताई और उनके संदेश का स्वागत किया। वांगचुक ने कहा कि संघर्ष का उद्देश्य केवल किसी मुद्दे को उठाना नहीं होता, बल्कि समाज में सकारात्मक सोच और जिम्मेदारी की भावना पैदा करना भी होता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि देश के युवा लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए भविष्य के भारत के निर्माण में सक्रिय योगदान देंगे।

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