तमिलनाडु सरकार का बड़ा फैसला, चौतरफा विरोध के बाद आरटीआई से जुड़ा विवादित आदेश वापस लिया

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जनता और विपक्ष के दबाव में सरकार का बड़ा कदम

राज्य सरकार ने भारी राजनीतिक विरोध और जनता की असंतुष्टि को देखते हुए कानून और व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण विभाग पर लिया गया अपना एक बड़ा फैसला वापस ले लिया है। पूर्व में जारी किए गए इस विवादित आदेश के तहत सार्वजनिक कानून और व्यवस्था विभाग को सूचना का अधिकार अधिनियम यानी आरटीआई के दायरे से बाहर रखने की घोषणा की गई थी। हालांकि, जैसे ही यह निर्णय सार्वजनिक हुआ, चारों तरफ से इसकी तीखी आलोचना शुरू हो गई, जिसके बाद प्रशासन को अपने कदम पीछे खींचने के लिए मजबूर होना पड़ा।

सरकार की ओर से इस संदर्भ में एक नया स्पष्टीकरण जारी किया गया है। इसमें कहा गया है कि विभाग को आरटीआई कानून की धारा 24 की उपधारा चार के तहत दी गई विशेष छूट से संबंधित पुराने प्रावधानों और पत्राचारों को अब पूरी तरह से निरस्त किया जाता है। पूर्व में इस विभाग को खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की श्रेणी में रखकर छूट देने का तर्क पेश किया गया था, जिसे बाद में प्रशासनिक स्तर पर समीक्षा के बाद रद्द कर दिया गया।

कानून और व्यवस्था विभाग से जुड़ा विवाद और उसकी गंभीरता

सार्वजनिक कानून और व्यवस्था का मुद्दा सीधे तौर पर नागरिकों के अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा हुआ है। इस विभाग के अंतर्गत पुलिस कार्रवाई, हिरासत में होने वाली मौतों, पुलिस प्रताड़ना के आरोपों और विभिन्न गंभीर घटनाओं की जांच रिपोर्ट शामिल होती हैं। यदि इस विभाग को आरटीआई के दायरे से बाहर रखा जाता, तो आम नागरिकों के लिए इन संवेदनशील मामलों से जुड़ी आधिकारिक जानकारी प्राप्त करना लगभग असंभव हो जाता।

प्रशासन की ओर से इस निर्णय पर सफाई देते हुए कहा गया कि आरटीआई के तहत केवल उन मामलों की जानकारी सीमित करने का विचार था जिनसे सामाजिक शांति भंग होने की आशंका बनी रहती है। अधिकारियों का तर्क था कि कुछ विशेष वर्गों में सामुदायिक तनाव पैदा करने वाली जानकारियों के लिए बड़े पैमाने पर आवेदन दिए जा रहे थे। इसी वजह से केवल कुछ विशेष अनुभागों को आरटीआई के दायरे से अलग रखने की योजना बनाई गई थी, लेकिन जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए इस पूरे फैसले पर दोबारा विचार किया गया।

विपक्षी दलों की कड़ी प्रतिक्रिया और विरोध

जैसे ही इस आदेश को आधिकारिक गजट में शामिल किया गया, राज्य के राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। विपक्षी नेताओं और सांसदों ने इस कदम की पुरजोर निंदा करते हुए इसे नागरिक अधिकारों का हनन करार दिया। एक प्रमुख सांसद ने इसे राज्य को पुलिस तंत्र में बदलने की कोशिश बताते हुए तुरंत आदेश को निरस्त करने की मांग उठाई थी। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता सबसे अहम होती है और उस पर किसी भी तरह का अंकुश स्वीकार्य नहीं है।

अन्य राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने भी इस कदम की आलोचना करते हुए याद दिलाया कि सूचना का अधिकार कानून लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत करने के लिए लाया गया था। कानून और व्यवस्था जैसे जनहित के मुद्दों पर आरटीआई का दायरा घटाने के बजाय उसे और अधिक विस्तृत किया जाना चाहिए। जब तक प्रशासन की कार्रवाई पारदर्शी नहीं होगी, तब तक आम जनता का तंत्र पर विश्वास कायम रहना बेहद मुश्किल होगा।

लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत और भविष्य की दिशा

चौतरफा घिरने के बाद सरकार के मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थिति को भांपते हुए सकारात्मक रुख अपनाया। प्रशासन की तरफ से यह आश्वासन दिया गया था कि यदि इस फैसले से आम जनता को असुविधा होती है या उनके अधिकारों का हनन महसूस होता है, तो मामले को उच्च स्तर पर ले जाकर सुधार किया जाएगा। अंततः जन दबाव और राजनीतिक विरोध के सम्मुख सरकार ने इस विवादित छूट को पूरी तरह खत्म कर दिया।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जीवंत लोकतंत्र में जनता की आवाज और पारदर्शिता का महत्व सर्वोपरि है। सूचना का अधिकार नागरिकों को सशक्त बनाने का एक सशक्त माध्यम है और इसमें किसी भी तरह की कटौती का विरोध स्वाभाविक है। सरकार द्वारा फैसला वापस लेने से न केवल जनता को राहत मिली है, बल्कि यह भी संदेश गया है कि जनहित के मामलों में सरकार को अपने रुख में लचीलापन दिखाना ही पड़ता है।

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