राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु बस्तर दशहरा उत्सव में हुईं शामिल, जनजातीय संस्कृति और मुरिया दरबार की परंपरा को बताया खास

छत्तीसगढ़ के बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को विश्वभर में विशिष्ट स्थान दिलाने वाला बस्तर दशहरा उत्सव एक बार फिर चर्चा में है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु जगदलपुर में आयोजित इस विश्वप्रसिद्ध उत्सव में शामिल हुईं। उन्होंने माँ दंतेश्वरी को नमन करते हुए बस्तर की समृद्ध धार्मिक परंपराओं, जनजातीय विरासत और सामाजिक एकता की सराहना की। राष्ट्रपति ने कहा कि लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह अनूठा आयोजन छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक गौरव और सामूहिक आस्था का जीवंत प्रतीक है।
राष्ट्रपति के अनुसार, बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह विभिन्न समुदायों को एक साथ जोड़ने और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को संरक्षित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। इसमें समाज के अलग-अलग वर्ग अपनी पारंपरिक जिम्मेदारियां निभाते हैं, जिससे आपसी सहयोग और सांस्कृतिक निरंतरता को मजबूती मिलती है।
बस्तर दशहरा में दिखती है सामाजिक एकता की अनूठी मिसाल
जगदलपुर में आयोजित बस्तर दशहरा उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विशिष्ट परंपराएं और व्यापक जनभागीदारी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि इस उत्सव में विभिन्न गोत्रों, समुदायों और समाज के सभी वर्गों की सक्रिय सहभागिता देखने को मिलती है।
रथ निर्माण से लेकर उसे खींचने, पूजा-अर्चना करने और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों को संपन्न कराने तक अलग-अलग समुदाय अपनी परंपरागत भूमिका निभाते हैं। यह व्यवस्था दर्शाती है कि किस प्रकार सांस्कृतिक आयोजन सामाजिक एकता और सामूहिक जिम्मेदारी का आधार बन सकते हैं।
बस्तर दशहरा की पहचान इसकी लंबी अवधि और स्थानीय रीति-रिवाजों से भी जुड़ी है। करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह पर्व क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता को सामने लाता है। राष्ट्रपति ने इस परंपरा को संरक्षित रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के महत्व पर जोर दिया।
मुरिया दरबार को बताया जमीनी लोकतंत्र का उदाहरण
राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा से जुड़ी मुरिया दरबार की परंपरा की विशेष रूप से सराहना की। उन्होंने इसे जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक मूल्यों और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।
मुरिया दरबार में समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर लोगों की समस्याओं, आवश्यकताओं और सामाजिक विषयों पर चर्चा करते हैं। संवाद के माध्यम से समस्याओं का समाधान तलाशने की यह परंपरा सामूहिक सहभागिता और आपसी सहयोग को बढ़ावा देती है।
राष्ट्रपति के अनुसार, ऐसी व्यवस्थाएं भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करती हैं। लोकतंत्र का वास्तविक महत्व केवल संस्थागत व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आम लोगों की भागीदारी और उनकी बात को महत्व देना भी शामिल है। मुरिया दरबार जैसी परंपराएं स्थानीय समुदायों को अपनी समस्याएं सामने रखने और मिलकर समाधान खोजने का अवसर देती हैं।
बस्तर पंडुम से नई पीढ़ी जुड़ रही है अपनी संस्कृति से
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बताया कि लगभग दो महीने पहले राष्ट्रपति भवन में बस्तर के एक प्रतिनिधिमंडल से उनकी मुलाकात हुई थी। इस प्रतिनिधिमंडल में बस्तर पंडुम के विजेताओं के साथ परगना मांझी और चालकी भी शामिल थे।
उन्होंने कहा कि बस्तर पंडुम जैसे आयोजन जनजातीय युवाओं को अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों और पारंपरिक ज्ञान से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे कार्यक्रम स्थानीय कला, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करते हैं।
जनजातीय परंपराओं का संरक्षण केवल अतीत को याद रखने तक सीमित नहीं है। इससे नई पीढ़ी अपनी जड़ों को समझती है और अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करना सीखती है। बस्तर जैसे क्षेत्रों में पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक अवसरों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना भी महत्वपूर्ण है।
जनजातीय युवाओं को मिले अवसर, खेलों में बढ़े भागीदारी
राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय समाज में प्रतिभा और संभावनाओं की कोई कमी नहीं है। जरूरत इस बात की है कि युवाओं को उचित अवसर, संसाधन और प्रोत्साहन उपलब्ध कराया जाए। इससे वे शिक्षा, खेल, कला, विज्ञान और अन्य क्षेत्रों में अपनी पहचान बना सकते हैं।
उन्होंने बस्तर ओलंपिक में जनजातीय युवाओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी की सराहना की। राष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि यदि इन खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण और उपयुक्त मंच मिले, तो वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकते हैं। भविष्य में बस्तर के युवा ओलंपिक जैसे प्रतिष्ठित आयोजनों में पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ा सकते हैं।
खेलों के माध्यम से युवाओं को आगे बढ़ने का अवसर देना उनके आत्मविश्वास और सामाजिक भागीदारी को मजबूत कर सकता है। इससे दूरदराज के क्षेत्रों में छिपी प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें आगे बढ़ाने में भी मदद मिलती है।
नक्सलवाद से मुक्ति के साथ विकास की ओर बढ़ता बस्तर
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की समस्या से मुक्ति की दिशा में हो रहे प्रयासों और सुरक्षा तथा विकास के क्षेत्र में आए सकारात्मक बदलावों का उल्लेख किया। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार के समन्वित प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि बस्तर अब प्रगति की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि क्षेत्र के युवा और जनजातीय समुदाय अपनी प्रतिभा, मेहनत और सक्रिय भागीदारी के माध्यम से देश की विकास यात्रा में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।
बस्तर में विकास के अवसर बढ़ने के साथ शिक्षा, खेल, रोजगार और स्थानीय उद्यमों को प्रोत्साहन देना भी महत्वपूर्ण है। जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना क्षेत्र के लिए नई संभावनाएं पैदा कर सकता है।
दंडकारण्य से जुड़ी है बस्तर की धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत
राष्ट्रपति ने बस्तर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि रामायण की परंपरा में इस क्षेत्र का संबंध दंडकारण्य से जोड़ा जाता है। भगवान श्रीराम के वनवास से जुड़े अनेक प्रसंग इस अंचल की सांस्कृतिक स्मृतियों में स्थान रखते हैं।
माता शबरी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज की विरासत भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। बस्तर की परंपराएं धार्मिक आस्था, लोकविश्वास और ऐतिहासिक स्मृतियों के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध बनाती हैं।
राष्ट्रपति ने भगवान श्रीराम के आदर्शों, माता सीता की मर्यादा और माता शबरी की भक्ति से प्रेरणा लेने की बात कही। उन्होंने समाज से नैतिकता, मानवीय मूल्यों और आपसी सम्मान को अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को सहेजना सबकी जिम्मेदारी
बस्तर दशहरा उत्सव के माध्यम से एक बार फिर क्षेत्र की धार्मिक आस्था, जनजातीय पहचान और सामाजिक समरसता का महत्व सामने आया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इस बात पर जोर दिया कि सदियों से चली आ रही परंपराओं का संरक्षण समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
बस्तर दशहरा, मुरिया दरबार, बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजन संस्कृति, संवाद और युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के अलग-अलग माध्यम हैं। इन परंपराओं को प्रोत्साहित करने से स्थानीय समुदायों की भागीदारी मजबूत होती है और आने वाली पीढ़ियों को अपनी विरासत से जुड़ने का अवसर मिलता है।
राष्ट्रपति का संदेश स्पष्ट है कि सांस्कृतिक धरोहर का सम्मान, जनजातीय समाज को अवसर और विकास में सामूहिक भागीदारी ही बस्तर को नई पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
