जाति जनगणना पर छिड़ा सियासी घमासान: कांग्रेस ने सरकार की नीयत पर उठाए सवाल,

देश में जारी आरक्षण से जुड़े तनावपूर्ण माहौल के बीच देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी ने जातिगत जनगणना के मुद्दे को एक बार फिर नए सिरे से गर्मा दिया है। विपक्षी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने केंद्र सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि सरकार जिस ढर्रे पर यह प्रक्रिया आगे बढ़ाना चाहती है, उससे सामाजिक न्याय का उद्देश्य कभी पूरा नहीं हो सकता। विपक्षी दल का दावा है कि वर्तमान रूपरेखा सिर्फ औपचारिकता पूरी करने का प्रयास है, जो देश के बड़े हिस्से के साथ वादाखिलाफी के समान है।
विपक्ष की ओर से यह तीखी प्रतिक्रिया तब सामने आई है जब जनगणना के प्रारूप में सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए ही अलग कॉलम रखा गया है, जबकि अन्य पिछड़े वर्गों और अन्य श्रेणियों के लिए कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं की गई है। इसी बिंदु को आधार बनाकर विपक्षी दल ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
हालिया संवाद में पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार सचमुच समाज के अंतिम व्यक्ति तक अधिकार पहुँचाना चाहती है, तो उसे मौजूदा योजना को तुरंत रद्द करना होगा। इसके स्थान पर उन राज्यों के तरीकों का अध्ययन किया जाना चाहिए, जहाँ हाल ही में व्यापक और वैज्ञानिक ढंग से सामाजिक-आर्थिक सर्वे कराए गए हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों में अपनाए गए मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करके ही निष्पक्ष और सटीक जानकारी जुटाई जा सकती है। इसके लिए सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाना और विषय-विशेषज्ञों की सलाह लेना बेहद आवश्यक है।
पार्टी का तर्क है कि देश में आरक्षण की पूरी संरचना और उसकी सीमाएँ सीधे तौर पर आबादी के सटीक आंकड़ों से जुड़ी हैं। यदि जातिगत आंकड़े ही पारदर्शी और प्रामाणिक नहीं होंगे, तो आरक्षण की व्यवस्था को संवैधानिक और कानूनी रूप से मजबूत बनाए रखना असंभव हो जाएगा। जाति आधारित गणना केवल एक औपचारिक सवाल पूछने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य हर वर्ग की वास्तविक आर्थिक और सामाजिक स्थिति को देश के सामने लाना होना चाहिए।
इस पूरे विवाद में यह बात भी उभरकर सामने आई है कि शीर्ष विपक्षी नेतृत्व ने देश के शीर्ष शासन स्तर पर कई बार पत्राचार किया है। पार्टी अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता ने शीर्ष नेतृत्व को विस्तार से कई पृष्ठों का पत्र भेजा है, जिसमें इस प्रक्रिया को बेहतर और प्रभावी बनाने के लिए कई रचनात्मक सुझाव दिए गए थे। यह प्रक्रिया को लेकर भेजा गया तीसरा औपचारिक पत्र था, जबकि इससे पहले भी दो मौकों पर लिखित सुझाव भेजे जा चुके हैं। विपक्षी पार्टी का आरोप है कि इतने महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले विषय पर बार-बार पत्र लिखे जाने के बावजूद सरकार की ओर से अब तक कोई सकारात्मक जवाब या संवाद की पहल नहीं देखने को मिली है।
