विकसित भारत के लिए कृषि को मजबूत बनाने पर जोर, शिवराज सिंह चौहान बोले- लैब से खेत तक तेजी से पहुंचे तकनीक

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी आईसीएआर की 97वीं वार्षिक आम बैठक में देश की कृषि व्यवस्था को अधिक किसान, बाजार और उपभोक्ता केंद्रित बनाने पर जोर दिया गया। नई दिल्ली के राष्ट्रीय कृषि विज्ञान परिसर में आयोजित बैठक में कृषि अनुसंधान को खेतों की वास्तविक जरूरतों से जोड़ने और प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीकों को तेजी से किसानों तक पहुंचाने की जरूरत पर चर्चा हुई। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य कृषि क्षेत्र को विकसित किए बिना पूरा नहीं किया जा सकता।
बैठक की अध्यक्षता करते हुए शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कृषि अनुसंधान केवल नई तकनीक या नए विचार विकसित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसका वास्तविक उद्देश्य किसानों की समस्याओं का समय पर समाधान करना और अनुसंधान से मिलने वाला लाभ सीधे खेत तक पहुंचाना होना चाहिए। उन्होंने मांग आधारित अनुसंधान को प्राथमिकता देने की बात कही, ताकि वैज्ञानिक प्रयास किसानों की जरूरत, बाजार की मांग और उपभोक्ताओं की अपेक्षाओं के अनुरूप किए जा सकें।
केंद्रीय मंत्री ने छोटे और सीमांत किसानों की आय बढ़ाने के लिए एकीकृत कृषि प्रणाली को महत्वपूर्ण बताया। इसके तहत खेती के साथ पशुपालन, मछली पालन, मुर्गी पालन, बागवानी और मधुमक्खी पालन जैसी गतिविधियों को जोड़ा जा सकता है। इससे किसानों को केवल एक फसल पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और पूरे वर्ष आय के अलग-अलग अवसर तैयार हो सकते हैं। उन्होंने गुणवत्तापूर्ण बीज और रोपण सामग्री की समय पर उपलब्धता, उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल, मृदा स्वास्थ्य और टिकाऊ कृषि पद्धतियों पर भी जोर दिया।
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत को केवल खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना है, बल्कि भारतीय कृषि उत्पादों की वैश्विक बाजार में मजबूत पहचान बनानी है। इसके लिए उत्पादों की गुणवत्ता, पोषण, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और शेल्फ लाइफ के साथ अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन जरूरी होगा। उन्होंने आईसीएआर और उद्योग के बीच साझेदारी को मजबूत करने की आवश्यकता बताई, ताकि वैज्ञानिक अनुसंधान से विकसित तकनीकें तेजी से व्यावसायिक और उपयोगी समाधान में बदल सकें।
कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को अगली बड़ी प्राथमिकता बताया। उन्होंने दलहन, तिलहन, बीज, पशुधन और मूल्यवर्धित प्रसंस्करण में देश की निर्भरता कम करने पर जोर दिया। साथ ही जलवायु अनुकूल खेती, मृदा स्वास्थ्य और संसाधनों के टिकाऊ इस्तेमाल के साथ किसान उत्पादक संगठनों को मजबूत करने और उन्हें बेहतर बाजार से जोड़ने की आवश्यकता बताई।
केंद्रीय राज्य मंत्री एसपी सिंह बघेल ने कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल पर जोर दिया। उन्होंने खाद्यान्न, बागवानी, डेयरी, मत्स्य पालन, मांस और अंडा उत्पादन में हुई प्रगति का उल्लेख करते हुए कृषि, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, मत्स्य पालन और मुर्गी पालन को अधिक एकीकृत करने की बात कही।
आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एमएल जाट ने परिषद की उपलब्धियां सामने रखीं। उन्होंने बताया कि कुल 386 नई फसल किस्में जारी की गई हैं, जिनमें 94 प्रतिशत जलवायु-प्रतिरोधी और 29 प्रतिशत जैव-संवर्धित किस्में हैं। इसके अलावा जीनोमिक्स, जीनोम एडिटिंग, पशुधन स्वास्थ्य, मत्स्य पालन, मृदा स्वास्थ्य और प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में भी काम आगे बढ़ा है।
आईसीएआर ने अनुसंधान को जमीन पर उतारने के साथ बौद्धिक संपदा और तकनीक के व्यावसायीकरण पर भी ध्यान बढ़ाया है। पिछले वर्ष करीब 805 बौद्धिक संपदा अधिकार आवेदन दाखिल किए गए और 36 संस्थानों में तकनीक के व्यावसायीकरण को मजबूत किया गया। बैठक में आईसीएआर और उद्योग एवं सीएसआर दाताओं के बीच कृषि अनुसंधान, नवाचार और तकनीक के विकास के लिए समझौता ज्ञापन भी किए गए।
बैठक में आईसीएआर की वार्षिक रिपोर्ट और वार्षिक खातों को भी अपनाया गया। चार प्रकाशन जारी किए गए और परिषद के नियमों एवं उपनियमों में संशोधन पर भी चर्चा हुई। राज्यों के प्रतिनिधियों और अन्य हितधारकों ने कृषि अनुसंधान, किसान कल्याण और कृषि क्षेत्र में केंद्र-राज्य सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया। पूरी चर्चा का मुख्य केंद्र यही रहा कि वैज्ञानिक नवाचार प्रयोगशालाओं तक सीमित न रहें, बल्कि उनका वास्तविक लाभ किसानों की आय, कृषि उत्पादकता, खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भर कृषि के रूप में खेतों पर दिखाई दे।
