आईआईटी दिल्ली ने बनाई दुनिया की पहली एआई लैब असिस्टेंट जो वैज्ञानिक की तरह खुद प्रयोग कर सकती है

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आईआईटी दिल्ली ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए दुनिया की पहली एआई लैब असिस्टेंट प्रणाली विकसित की है जो इंसानी वैज्ञानिक की तरह प्रयोगशाला में खुद प्रयोग कर सकती है। यह अत्याधुनिक प्रणाली डेनमार्क और जर्मनी के वैज्ञानिकों के सहयोग से तैयार की गई है और इसका शोध प्रतिष्ठित जर्नल नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक आने वाले समय में वैज्ञानिक अनुसंधान के तौर तरीकों को पूरी तरह बदल सकती है।

अब तक एआई का उपयोग मुख्य रूप से टेक्स्ट लिखने या सवालों के जवाब देने तक सीमित था लेकिन यह नई एआई लैब असिस्टेंट प्रयोगों की योजना बना सकती है उपकरण चला सकती है माइक्रोस्कोप को सेट कर सकती है आंकड़ों का विश्लेषण कर सकती है और वैज्ञानिक की तरह फैसले भी ले सकती है। आईआईटी दिल्ली के पीएचडी शोधार्थी और इस शोध के पहले लेखक इंद्रजीत मंडल के अनुसार पहले एटॉमिक फोर्स माइक्रोस्कोप की सही सेटिंग करने में पूरा दिन लग जाता था लेकिन अब वही काम यह एआई सिस्टम सिर्फ कुछ मिनटों में कर देता है जिससे शोध की रफ्तार कई गुना तेज हो जाती है।

इस शोध का मुख्य केंद्र एटॉमिक फोर्स माइक्रोस्कोप रहा है जो नैनो स्तर पर पदार्थों की जांच के लिए इस्तेमाल किया जाता है और इसे चलाना बेहद जटिल होता है। आमतौर पर इसे संचालित करने के लिए वर्षों का अनुभव चाहिए होता है लेकिन एआई लैब असिस्टेंट ने खुद सीखकर और स्वतः निर्णय लेते हुए यह काम संभव कर दिखाया है। आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर नित्यानंद गोस्वामी ने कहा कि इतने संवेदनशील उपकरण को एआई द्वारा नियंत्रित किया जाना प्रयोगात्मक विज्ञान में एक बड़ी क्रांति की तरह है।

हालांकि इस तकनीक को विकसित करना आसान नहीं था क्योंकि कई एआई मॉडल सैद्धांतिक रूप से सही होते हुए भी वास्तविक लैब परिस्थितियों में गड़बड़ कर देते थे जिससे उपकरणों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता था इसलिए शोधकर्ताओं ने कड़े सुरक्षा उपायों पर भी विशेष जोर दिया है। भारत सरकार की ओर से हाल ही में नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के तहत एआई फॉर साइंस में बड़े निवेश की घोषणा भी की गई है जिससे इस तरह की तकनीकों को और बढ़ावा मिलेगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे ऊर्जा भंडारण टिकाऊ सामग्री और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में खोज की गति तेज होगी और भारत को वैश्विक स्तर पर स्वचालित प्रयोगशाला विज्ञान में अग्रणी बनने का अवसर मिलेगा

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