तीन भाषा नीति पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CBSE की नई व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई शुरू

देश में स्कूल शिक्षा और भाषा नीति को लेकर एक बार फिर बड़ा कानूनी और शैक्षणिक विवाद सामने आया है। सर्वोच्च न्यायालय ने कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए लागू की गई नई भाषा नीति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने का फैसला किया है। इस मामले में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। इस फैसले के बाद शिक्षा जगत, अभिभावकों और छात्रों के बीच नई चर्चा शुरू हो गई है।
दरअसल, हाल ही में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने एक नया परिपत्र जारी किया था, जिसके अनुसार पहली जुलाई से कक्षा 9 में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य कर दिया गया है। इस नीति के तहत कम से कम दो भारतीय भाषाओं को पढ़ना जरूरी होगा। बोर्ड का कहना है कि यह कदम भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने और छात्रों को देश की भाषाई विविधता से जोड़ने के उद्देश्य से उठाया गया है।
हालांकि इस नीति को लेकर कई अभिभावकों, शिक्षा विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने चिंता जाहिर की है। उनका मानना है कि छात्रों पर पहले से ही पढ़ाई का दबाव काफी अधिक है और ऐसे में अतिरिक्त भाषा पढ़ने की अनिवार्यता से मानसिक दबाव बढ़ सकता है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि अलग-अलग राज्यों और शिक्षा पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों के लिए यह नियम व्यावहारिक चुनौतियां पैदा कर सकता है।
याचिका में यह तर्क दिया गया है कि छात्रों को भाषा चयन की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और किसी विशेष ढांचे को अनिवार्य बनाना शिक्षा के अधिकार और व्यक्तिगत पसंद के सिद्धांतों के खिलाफ हो सकता है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि इस नीति पर पुनर्विचार किया जाए और इसे लागू करने से पहले सभी पक्षों की राय ली जाए।
दूसरी ओर, नई शिक्षा नीति के समर्थकों का कहना है कि भारतीय भाषाओं का संरक्षण और प्रचार समय की जरूरत है। उनका मानना है कि विद्यार्थियों को अपनी मातृभाषा और अन्य भारतीय भाषाओं से जोड़ना सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण कदम है। इससे छात्रों में देश की विविध संस्कृति को समझने की क्षमता विकसित होगी और भारतीय भाषाओं को नई पीढ़ी में मजबूत पहचान मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई को शिक्षा व्यवस्था के लिए अहम माना जा रहा है क्योंकि इसका असर आने वाले समय में स्कूलों की भाषा नीति और पाठ्यक्रम पर पड़ सकता है। फिलहाल अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई जल्द होने की संभावना है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच छात्र और अभिभावक यह जानने को उत्सुक हैं कि आने वाले समय में यह नीति लागू रहेगी या इसमें कोई बदलाव किया जाएगा। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का अंतिम फैसला देश की भाषा शिक्षा व्यवस्था के भविष्य को नई दिशा दे सकता है।
