महिला वकील पर क्रूर हमले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अस्पतालों द्वारा इलाज से इनकार की जांच के आदेश

सर्वोच्च न्यायालय ने एक महिला वकील पर उसके पति द्वारा किए गए कथित क्रूर हमले के मामले में गंभीर रुख अपनाते हुए स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने इस मामले में विशेष रूप से उस आरोप पर चिंता जताई है, जिसमें कहा गया कि घायल महिला को तीन अलग-अलग अस्पतालों ने आपातकालीन उपचार देने से मना कर दिया। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल घरेलू हिंसा बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की संवेदनशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह मामला कड़कड़डूमा अदालत में कार्यरत वकील स्नेहा कलिता से जुड़ा है, जिन्होंने अपने साथ हुई हिंसक घटना के संबंध में एक पत्र लिखा था। इसी पत्र के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची की पीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए तत्काल जांच के निर्देश दिए।
जानकारी के अनुसार, महिला वकील पर उसके पति ने कथित रूप से बेहद क्रूर हमला किया, जिससे उसे गंभीर चोटें आईं। घटना के बाद उसे इलाज के लिए कई अस्पतालों में ले जाया गया, लेकिन आरोप है कि तीन अस्पतालों ने उसे भर्ती करने से इनकार कर दिया। यह स्थिति बेहद चिंताजनक मानी जा रही है, क्योंकि आपातकालीन स्थिति में मरीज को तत्काल चिकित्सा सहायता मिलना सबसे जरूरी होता है। बाद में उसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स में भर्ती कराया गया, जहां उसका इलाज शुरू हुआ और फिलहाल उसकी हालत स्थिर बताई जा रही है।
सर्वोच्च न्यायालय ने अस्पतालों द्वारा इलाज से इनकार किए जाने पर गहरी नाराजगी जताई। अदालत ने जांच अधिकारी को निर्देश दिया है कि वह पूरे मामले की स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करे और यह स्पष्ट करे कि किन परिस्थितियों में अस्पतालों ने उपचार से मना किया। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी आपातकालीन स्थिति में अस्पताल इलाज से इनकार करते हैं, तो यह बेहद गंभीर विषय है और इसकी पूरी जांच होनी चाहिए।
इस मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर आरोपी पति को गिरफ्तार कर लिया है। अदालत ने दंपति के दो लापता बच्चों को लेकर भी चिंता जताई और पुलिस को उन्हें जल्द से जल्द खोजने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि परिवार के सबसे बड़े बच्चे को फिलहाल उसके नाना-नानी के साथ रखा जाएगा ताकि उसकी सुरक्षा और देखभाल सुनिश्चित की जा सके।
साथ ही, अदालत ने राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि पीड़िता को अंतरिम वित्तीय सहायता प्रदान की जाए। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है ताकि पीड़िता को इलाज, कानूनी प्रक्रिया और अन्य आवश्यक जरूरतों के लिए तत्काल सहयोग मिल सके।
यह मामला केवल घरेलू हिंसा का नहीं, बल्कि संवेदनशील संस्थाओं की जिम्मेदारी का भी है। न्यायालय की सख्ती यह संकेत देती है कि महिलाओं की सुरक्षा और आपातकालीन चिकित्सा सुविधा जैसे मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा। आने वाले दिनों में इस मामले की जांच और अदालत की आगे की कार्रवाई पर सभी की नजर बनी रहेगी।
