चंडीगढ़ में डॉ. महिंदर सिंह रंधावा साहित्य और कला मेला-2026 आयोजित, पंजाबी विरासत को सहेजने पर विशेष जोर
चंडीगढ़ में ‘डॉ. महिंदर सिंह रंधावा साहित्य और कला मेला-2026’ का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भाग लिया। यह आयोजन पंजाब की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक कला और साहित्यिक परंपराओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया। मेले के दौरान यह संदेश स्पष्ट रूप से सामने आया कि अपनी जड़ों से जुड़े रहना और सांस्कृतिक पहचान को संजोना आज के दौर में बेहद जरूरी है।
कार्यक्रम में कहा गया कि डॉ. महिंदर सिंह रंधावा ने पंजाबी साहित्य, कला और संस्कृति के संरक्षण और विकास में अमूल्य योगदान दिया है। उनके विचार और कार्य आज भी समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं। इस साहित्य और कला मेले को उनके योगदान को सम्मान देने और नई पीढ़ी तक उनके विचारों को पहुंचाने के एक सशक्त माध्यम के रूप में देखा जा रहा है।
मेले के दौरान साहित्यिक चर्चाएं, कवि सम्मेलन, कला प्रदर्शनियां और लोक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित की गईं। विभिन्न कलाकारों और लेखकों ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि आधुनिकता और वैश्वीकरण के इस दौर में अपनी भाषा, कला और सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से न केवल कलाकारों को मंच मिलता है, बल्कि समाज में सांस्कृतिक चेतना भी मजबूत होती है।
वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि पंजाब की समृद्ध विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। युवाओं को साहित्य और कला से जोड़ने के लिए इस तरह के आयोजनों की निरंतरता बेहद जरूरी है। इससे न केवल उनमें अपनी संस्कृति के प्रति गर्व की भावना विकसित होगी, बल्कि वे अपनी पहचान को भी बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि साहित्य और कला किसी भी समाज की आत्मा होते हैं। जब तक इन्हें संरक्षण और प्रोत्साहन मिलता रहेगा, तब तक समाज की सांस्कृतिक धरोहर भी जीवंत बनी रहेगी। डॉ. महिंदर सिंह रंधावा साहित्य और कला मेला इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है, जो पंजाब की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊर्जा देने का काम कर रहा है।
आयोजकों का कहना है कि इस तरह के आयोजन भविष्य में भी जारी रहेंगे, ताकि पंजाब की कला, साहित्य और संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सके। यह मेला न केवल अतीत की विरासत को सम्मान देने का मंच है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने की एक सार्थक पहल भी है। कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सहेजना ही किसी भी समाज की सच्ची प्रगति का आधार है।
