भारत टेक्स 2026: 2030 तक 9 लाख करोड़ रुपये निर्यात का लक्ष्य, भारतीय वस्त्र और कारीगरों को मिलेगी वैश्विक पहचान

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भारत का वस्त्र और परिधान उद्योग अब केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक शिल्पकला और आधुनिक डिज़ाइन क्षमता के मेल ने भारतीय ब्रांडों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नए अवसर पैदा किए हैं। इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए भारत टेक्स 2026 के तहत नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित एक विशेष सत्र में भारतीय ब्रांडों के वैश्विक विस्तार, निर्यात बढ़ाने और कारीगरों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने पर विस्तार से चर्चा की गई।

इस अवसर पर केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि भारतीय ब्रांडों, डिज़ाइनरों और कारीगरों के लिए यह समय वैश्विक पहचान स्थापित करने का सबसे अनुकूल दौर है। उन्होंने कहा कि भारत का वस्त्र उद्योग अब केवल पारंपरिक विनिर्माण पर निर्भर नहीं है, बल्कि गुणवत्ता, डिज़ाइन नवाचार और सांस्कृतिक विशिष्टता के दम पर दुनिया के बड़े बाजारों में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रहा है। उनका मानना है कि भारतीय कारीगर देश की सबसे बड़ी पूंजी हैं और उनकी कला को वैश्विक मंच तक पहुंचाना सरकार की प्राथमिकता है।

बैठक के दौरान यह जानकारी भी साझा की गई कि वर्ष 2025-26 में भारत का कपड़ा एवं परिधान निर्यात लगभग 3.16 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। सरकार ने वर्ष 2030 तक इस आंकड़े को बढ़ाकर 9 लाख करोड़ रुपये तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मुक्त व्यापार समझौतों के बढ़ते नेटवर्क का लाभ उठाने, वैश्विक बाजारों तक बेहतर पहुंच बनाने, मजबूत ब्रांड पहचान विकसित करने और बदलती उपभोक्ता मांग के अनुरूप उत्पाद तैयार करने पर विशेष जोर दिया गया।

विशेष सत्र में भारतीय वस्त्र एवं लाइफस्टाइल ब्रांडों की वैश्विक संभावनाओं पर भी विस्तार से चर्चा हुई। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की पारंपरिक बुनाई, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विरासत दुनिया में अपनी अलग पहचान रखती है। यदि इन्हें आधुनिक मार्केटिंग, बेहतर ब्रांडिंग और डिजिटल तकनीक के साथ जोड़ा जाए तो भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं।

फैशन जगत से जुड़े विशेषज्ञों ने भी भारतीय शिल्पकला की मौलिकता और प्रामाणिकता को सबसे बड़ी ताकत बताया। उनका कहना था कि भारतीय बुनाई और पारंपरिक शिल्प को उसी मूल स्वरूप में दुनिया के सामने प्रस्तुत करना आवश्यक है। इससे न केवल भारत की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी बल्कि हजारों कारीगरों और बुनकरों को स्थायी रोजगार के अवसर भी मिलेंगे। कई विशेषज्ञों ने विलुप्त होती पारंपरिक बुनाई को पुनर्जीवित करने और नई पीढ़ी को इससे जोड़ने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

कार्यक्रम में ई-कॉमर्स और डिजिटल तकनीक को भारतीय ब्रांडों के वैश्विक विस्तार का सबसे प्रभावी माध्यम बताया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के कारीगर भी सीधे अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा आधारित रणनीति, क्षेत्रीय भाषाओं में डिजिटल समाधान और बी2सी निर्यात को बढ़ावा देने जैसे उपाय भारतीय उत्पादों की वैश्विक पहुंच को और मजबूत बना सकते हैं।

उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने क्लस्टर आधारित विकास, आधुनिक विनिर्माण व्यवस्था, समय पर आपूर्ति, गुणवत्ता नियंत्रण और पारदर्शिता को भारतीय ब्रांडों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए बेहद जरूरी बताया। साथ ही सुझाव दिया गया कि वैश्विक स्तर पर भारतीय ब्रांडों को नई पहचान दिलाने के लिए एक समर्पित संस्थान की स्थापना की जानी चाहिए। कार्यक्रम का समापन सरकार और उद्योग के बीच मजबूत साझेदारी, भारतीय हस्तशिल्प की वैश्विक दृश्यता बढ़ाने, कारीगरों को नए अवसर उपलब्ध कराने और भारत को विश्व के अग्रणी टेक्सटाइल ब्रांड के रूप में स्थापित करने के साझा संकल्प के साथ हुआ।

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