एआई चैटबॉट और साइकोसिस का खतरा, जब तकनीक दिमाग को भ्रम की ओर धकेल दे

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को आज भविष्य की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति माना जा रहा है, लेकिन इसके साथ एक ऐसा खतरा भी उभर रहा है जो इंसानी दिमाग पर गहरा असर डाल सकता है। दुनिया भर में हो रहे हालिया शोध और विशेषज्ञों की चेतावनियां इशारा कर रही हैं कि एआई चैटबॉट से लगातार और लंबे समय तक बातचीत करने वाले कुछ लोगों में साइकोसिस यानी मनोविकृति जैसे लक्षण उभरने लगे हैं। यह स्थिति तब पैदा होती है जब व्यक्ति वास्तविक और अवास्तविक के बीच फर्क करना खो देता है और उसकी सोच भ्रम और कल्पना में उलझ जाती है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ के अनुसार साइकोसिस कोई एक बीमारी नहीं बल्कि लक्षणों का समूह है, जिसमें इंसान का वास्तविकता से संपर्क टूटने लगता है। ऐसे लोग समाज से कटने लगते हैं, स्पष्ट रूप से सोच नहीं पाते, भावनात्मक रूप से अस्थिर हो जाते हैं और कई बार अपनी निजी देखभाल तक छोड़ देते हैं। नींद की कमी, अजीब विचार, बोलचाल में उलझन और काम या पढ़ाई में गिरावट इसके आम संकेत माने जाते हैं।

हाल ही में वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में सामने आया है कि अमेरिका समेत कई देशों में मनोवैज्ञानिकों के पास ऐसे मरीज पहुंचे हैं जो लंबे समय तक एआई टूल्स से बातचीत के बाद भ्रम और मानसिक असंतुलन का शिकार हो गए। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के मनोचिकित्सक कीथ सकाता का कहना है कि एआई खुद भ्रम पैदा नहीं करता, लेकिन जब कोई व्यक्ति अपनी काल्पनिक दुनिया या डर को एआई के सामने रखता है तो चैटबॉट उसे उसी रूप में वापस दोहराता है और वह भ्रम और मजबूत हो जाता है। इस तरह इंसान और मशीन दोनों मिलकर एक खतरनाक चक्र बना देते हैं।

रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि कुछ मामलों में एआई से जुड़ी इस मानसिक उलझन ने लोगों को आत्मघाती कदम तक उठाने पर मजबूर कर दिया, जिसके बाद गलत मौतों से जुड़े मुकदमे भी दर्ज हुए हैं। यह स्थिति बताती है कि तकनीक जितनी मददगार है उतनी ही संवेदनशील भी और इसका इस्तेमाल करते समय मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।

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