डीएसडी पर जागरूकता बढ़ाने की एम्स की अपील, कहा सही इलाज और परामर्श से संभव है बेहतर भविष्य

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ने प्रजनन क्षमता से जुड़े विकार डीएसडी यानी डिसऑर्डर्स ऑफ सेक्स डेवलपमेंट को लेकर समाज में जागरूकता बढ़ाने की अपील की है। एम्स का कहना है कि डीएसडी कोई दुर्लभ या डराने वाली बीमारी नहीं बल्कि कुछ विशेष आनुवंशिक और हार्मोनल स्थितियों का समूह है, जिसमें बच्चे का लिंग विकास सामान्य से अलग हो सकता है। एम्स नई दिल्ली के निदेशक डॉ एम श्रीनिवास ने बताया कि इस स्थिति से जूझ रहे कई बच्चों को समाज में उपेक्षा और गलतफहमी का सामना करना पड़ता है और कई माता पिता भी जानकारी के अभाव में अनावश्यक रूप से घबरा जाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि समय पर सही चिकित्सा सलाह और परामर्श से बच्चों को सामान्य और स्वस्थ जीवन जीने में मदद मिल सकती है।
डॉ श्रीनिवास ने यह भी कहा कि एम्स में विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक टीम इस तरह के मामलों का इलाज और मार्गदर्शन देने के लिए लगातार काम कर रही है ताकि बच्चों और उनके परिवारों को सही दिशा मिल सके। उनका मानना है कि समाज में स्वीकार्यता और वैज्ञानिक समझ बढ़ेगी तो इन बच्चों को बेहतर माहौल मिल पाएगा।
इसी विषय पर आकाशवाणी समाचार से बातचीत में एम्स के बाल रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ वंदना जैन ने कहा कि डीएसडी को किसी असामान्य बीमारी की तरह देखने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह केवल एक आनुवंशिक विकार है, जिसे सही तरीके से समझा और संभाला जा सकता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे ऐसी स्थितियों को लेकर किसी तरह का भेदभाव न करें और चिकित्सा विशेषज्ञों से सलाह लें।
डॉ जैन ने मन की बात कार्यक्रम का जिक्र करते हुए यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एंटीबायोटिक दवाओं के गलत इस्तेमाल से पैदा होने वाली एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस को एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बताया है। उन्होंने दोहराया कि किसी भी एंटीबायोटिक दवा का सेवन केवल डॉक्टर की सलाह पर ही किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में इन दवाओं की प्रभावशीलता बनी रहे और मरीजों को सही इलाज मिल सके।
