कंधे में दर्द और जकड़न कहीं फ्रोजन शोल्डर तो नहीं?

कंधे में दर्द और जकड़न की बढ़ती समस्या
अक्सर लोग कंधे में होने वाले दर्द, जकड़न या हाथ को ऊपर उठाने में महसूस होने वाली परेशानी को बढ़ती उम्र का असर मान लेते हैं। कई बार इसे शरीर में कैल्शियम की कमी या हड्डियों की सामान्य कमजोरी से जोड़कर भी देखा जाता है। हालांकि अगर आपके कंधे की मूवमेंट धीरे-धीरे कम हो रही है और रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम जैसे बाल बनाना, कपड़े पहनना या हाथ पीछे ले जाना मुश्किल होने लगा है, तो इसके पीछे की असल वजह फ्रोजन शोल्डर हो सकती है। इसे नजरअंदाज करना सेहत के लिए काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है।
मेडिकल भाषा में क्या है फ्रोजन शोल्डर
चिकित्सा क्षेत्र में फ्रोजन शोल्डर को एडहेसिव कैप्सुलाइटिस कहा जाता है। हमारे कंधे के जोड़ के चारों ओर एक सुरक्षात्मक कैप्सूल यानी लचीला टिशू होता है। जब इस कैप्सूल में सूजन आ जाती है और धीरे-धीरे टिशू सख्त होने लगते हैं, तो इस प्रक्रिया को फाइब्रॉसिस कहा जाता है। टिशू के सख्त और मोटे होने के कारण कंधे के जोड़ की गति सीमित होने लगती है। यही वजह है कि प्रभावित व्यक्ति को हाथ हिलाने पर तेज दर्द और असहनीय जकड़न का अहसास होता है।
बीमारी के मुख्य लक्षण और रोजमर्रा की दिक्कतें
इस समस्या में केवल मांसपेशियों या हड्डियों का दर्द ही शामिल नहीं होता, बल्कि कंधे की प्राकृतिक गति क्षमता भी लगातार घटने लगती है। शुरुआत के दौर में मरीज को काफी तेज दर्द महसूस हो सकता है, जो समय के साथ कंधे की भारी अकड़न में बदल जाता है। इसके कारण इंसान अपने रोजमर्रा के सामान्य कार्य भी ठीक से नहीं कर पाता। पीठ के पीछे हाथ ले जाना, अलमारी से कोई सामान निकालना या शर्ट पहनना भी एक बड़ी चुनौती बन जाता है।
डायबिटीज और फ्रोजन शोल्डर का गहरा कनेक्शन
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार मधुमेह यानी डायबिटीज को फ्रोजन शोल्डर का एक बेहद प्रमुख जोखिम कारक माना जाता है। जिन लोगों के शरीर में ब्लड शुगर का स्तर लगातार अनियंत्रित रहता है, उनमें इस बीमारी के विकसित होने की संभावना सामान्य लोगों की तुलना में कई गुना अधिक होती है। अनियंत्रित शुगर के कारण शरीर में कोलाजन नामक प्रोटीन में बदलाव आने लगते हैं, जिससे कंधे का कैप्सूल तेजी से सख्त और मोटा होने लगता है।
शोध और आंकड़ों के चौंकाने वाले खुलासे
विभिन्न स्वास्थ्य अध्ययनों में यह पाया गया है कि डायबिटीज के मरीजों में फ्रोजन शोल्डर का प्रसार लगभग तेरह प्रतिशत से अधिक होता है। बिना डायबिटीज वाले व्यक्तियों की तुलना में शुगर से पीड़ित मरीजों में यह समस्या होने का खतरा लगभग पांच गुना ज्यादा देखा गया है। यही कारण है कि यदि किसी डायबिटीज के मरीज को कंधे में जकड़न या दर्द महसूस होने लगे, तो उसे केवल हड्डियों का दर्द समझकर टालने के बजाय तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
इसे केवल हड्डियों की कमजोरी समझने की भूल न करें
ज्यादातर लोग कंधे के दर्द को आर्थराइटिस या हड्डियों की घिसावट मानकर साधारण दर्द निवारक दवाइयां लेने लगते हैं। लेकिन फ्रोजन शोल्डर में समस्या हड्डियों में न होकर जोड़ के आसपास के कैप्सूल और सॉफ्ट टिश्यूज में होती है। सही समय पर इसकी पहचान न होने से कंधा पूरी तरह से लॉक भी हो सकता है, जिससे मरीज का हाथ काम करना बंद कर देता है और रिकवरी में काफी लंबा समय लग जाता है।
शुरुआती दौर में पहचान और सही इलाज की जरूरत
यदि कंधे के दर्द की पहचान शुरुआती चरण में ही हो जाए, तो इसे एक्सरसाइज और फिजियोथेरेपी की मदद से काफी हद तक ठीक किया जा सकता है। इसके साथ ही डायबिटीज के मरीजों को अपना ब्लड शुगर लेवल नियंत्रित रखना बेहद जरूरी होता है। शुगर लेवल कंट्रोल में रहने से जोड़ के कैप्सूल पर पड़ने वाला नकारात्मक प्रभाव कम होता है और दर्द में राहत मिलती है।
रोकथाम और सही दिनचर्या का महत्व
फ्रोजन शोल्डर से बचाव और इसके असर को कम करने के लिए नियमित रूप से स्ट्रेचिंग और कंधों की हल्की एक्सरसाइज करना फायदेमंद होता है। यदि आपके परिवार में किसी को डायबिटीज है और उन्हें कंधे में भारीपन या दर्द महसूस हो रहा है, तो बिना देर किए विशेषज्ञ चिकित्सक से सलाह लें। सही समय पर लिया गया डॉक्टरी परामर्श आपको इस लंबी और दर्दनाक समस्या से बचा सकता है।
