ग्लोबल साउथ के लिए मिसाल बना भारत का जल प्रबंधन मॉडल, पीएमओ ने साझा किया प्रेरणादायक लेख

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जलवायु परिवर्तन और तेजी से बढ़ती आबादी के इस दौर में जल सुरक्षा पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। ऐसे समय में भारत द्वारा अपनाए गए जल संरक्षण और प्रबंधन के मॉडल की सराहना वैश्विक स्तर पर हो रही है। भारत का यह मॉडल दुनिया के विकासशील और ग्लोबल साउथ के देशों के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकता है। जल सुरक्षा की अवधारणा केवल बड़े बांधों, नहरों या बुनियादी ढांचे के निर्माण तक ही सीमित नहीं है। इसके लिए जमीनी स्तर पर सटीक योजना, सुदृढ़ स्थानीय व्यवस्था और सबसे महत्वपूर्ण आम जनता व समुदायों की सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता होती है।

संरचनात्मक सुधारों से सामुदायिक भागीदारी तक

भारत में जल प्रशासन को मजबूत करने के लिए पिछले कुछ वर्षों में नीतिगत और व्यवहारिक दोनों स्तरों पर बड़े बदलाव किए गए हैं। पश्चिमी राज्य गुजरात में वर्षों पहले शुरू हुए जल सुधारों से लेकर वर्तमान में पूरे देश में चलाए जा रहे विशाल राष्ट्रीय अभियानों तक की यात्रा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। यह पूरी व्यवस्था उन तमाम देशों के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करती है जो अपने नागरिकों को स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने और पानी की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जब तक जल प्रबंधन में आम लोगों को साझेदार नहीं बनाया जाता, तब तक किसी भी नीति का दीर्घकालिक लाभ मिलना संभव नहीं होता।

जल सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन पर केंद्रित मंथन

देश की राजधानी में आयोजित ‘इंडिया इंटरनेशनल वाटर वीक’ के हालिया संस्करण में जलवायु-अनुकूल जल प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर गंभीर विचार-विमर्श किया गया। इस दौरान बीते एक दशक में भारत द्वारा जल क्षेत्र में हासिल की गई महत्वपूर्ण सफलताओं और भविष्य की चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया। भविष्य की प्रमुख प्राथमिकताओं में जल आपूर्ति को लगातार टिकाऊ बनाए रखना, कृषि व उद्योगों में पानी का विवेकपूर्ण इस्तेमाल सुनिश्चित करना और इस्तेमाल किए जा चुके गंदे पानी का पुनः चक्रण कर उसे आर्थिक व पर्यावरणीय संसाधन के रूप में उपयोग करना शामिल है।

वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते प्रभाव का दौर

बीते कुछ वर्षों के आंकड़ों और जमीनी बदलावों को देखें तो वैश्विक जल परिदृश्य में भारत की साख काफी मजबूत हुई है। एक समय था जब भारत बाढ़ और भीषण सूखे जैसी मौसमी चरम स्थितियों से लगातार प्रभावित होता था, लेकिन अब स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। भारत ने खुद को इन जलवायु चुनौतियों का सामना करने के लिए न केवल सक्षम बनाया है बल्कि ऐसे तंत्र भी विकसित किए हैं जो विपरीत परिस्थितियों में भी जल की उपलब्धता बनाए रखते हैं। यही अनुभव और विशेषज्ञता अब विकासशील देशों के लिए अध्ययन का विषय बनी हुई है।

गुजरात के प्रयोगों से राष्ट्रीय नीति तक का सफर

भारत की इस सफलता की नींव दो दशक पहले रखी गई थी। वर्ष 2001 से 2014 के बीच गुजरात में मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी द्वारा जल संरक्षण और चेक डैम निर्माण के जो व्यापक प्रयोग किए गए थे, वे बेहद सफल सिद्ध हुए। गुजरात के इस मॉडल को एक प्रयोगशाला के रूप में देखा गया, जहाँ मिली सफलताओं और सीखों को आगे चलकर पूरे देश में लागू किया गया। इस जमीनी अनुभव ने देश की जल नीति को एक नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

राष्ट्रीय स्तर की प्रमुख योजनाओं का व्यापक असर

वर्ष 2014 के बाद देश में जल और स्वच्छता के क्षेत्र में कई महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किए गए। इनमें स्वच्छ भारत मिशन, जल जीवन मिशन, जल शक्ति अभियान, नमामि गंगे, अटल भूजल योजना और कृषि क्षेत्र के लिए ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ जैसी दूरदर्शी योजनाएं शामिल हैं। इन सभी अभियानों ने मिलकर देश के दूर-दराज के इलाकों तक नल से जल पहुंचाने, नदियों को पुनर्जीवित करने और भूजल स्तर को सुधारने में अभूतपूर्व योगदान दिया है।

भविष्य की चुनौतियों का मुकाबला और आगे की राह

यद्यपि भारत ने जल क्षेत्र में कई मील के पत्थर हासिल किए हैं, फिर भी बढ़ती आबादी और औद्योगीकरण के कारण चुनौतियां बनी हुई हैं। आने वाले समय में जल संसाधनों का न्यायसंगत वितरण, वर्षा जल का अधिकतम संचयन और इस्तेमाल किए गए पानी का पुनः उपयोग ही सफलता की कुंजी होगा। भारत द्वारा अपनाए गए ये बहुआयामी दृष्टिकोण यह सिद्ध करते हैं कि इच्छाशक्ति और सामुदायिक सहयोग के बल पर जल संकट जैसी बड़ी आपदा से भी सफलतापूर्वक निपटा जा सकता है।

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