ब्रेन डेथ के बाद कैसे होता है अंगदान, जानें डॉक्टर की जांच से लेकर ट्रांसप्लांट तक की पूरी प्रक्रिया

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चिकित्सा विज्ञान में अंगदान को जीवन का सबसे बड़ा उपहार माना जाता है क्योंकि यह एक मृतप्राय या गंभीर स्थिति में पहुंच चुके व्यक्ति के माध्यम से कई अन्य लोगों को नया जीवन देने का अवसर प्रदान करता है। इसके बावजूद आम जनता के बीच इस प्रक्रिया को लेकर जानकारी का अभाव है। लोग अक्सर यह नहीं समझ पाते कि किसी मरीज को ब्रेन डेड घोषित किए जाने के बाद से लेकर उसके अंगों को किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर में प्रत्यारोपित करने तक पर्दे के पीछे किस तरह की चिकित्सा, कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाएं काम करती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में डॉक्टरों का सटीक परीक्षण, विभिन्न मेडिकल टीमों का बेहतर समन्वय और समय की सबसे बड़ी भूमिका होती है।

आमतौर पर लोगों के मन में यह भ्रम रहता है कि ब्रेन डेथ और कोमा एक ही स्थिति हैं, जबकि चिकित्सा की दृष्टि से दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। कोमा में गया मरीज समय के साथ ठीक हो सकता है और उसके दिमाग की गतिविधियां पूरी तरह समाप्त नहीं होती हैं। इसके विपरीत ब्रेन डेथ का सीधा अर्थ है कि मस्तिष्क की कोशिकाएं पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं और दिमाग ने काम करना हमेशा के लिए बंद कर दिया है। इसमें दिमाग का वह हिस्सा भी निष्क्रिय हो जाता है जो शरीर की स्वतः सांस लेने की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। ब्रेन डेड व्यक्ति कभी भी अपने आप सांस नहीं ले सकता और न ही उसके मस्तिष्क के पुनर्जीवित होने की कोई गुंजाइश बचती है।

किसी भी मरीज को आधिकारिक रूप से ब्रेन डेड घोषित करने से पहले डॉक्टरों का एक विशेष दल बेहद कड़े और सटीक परीक्षण करता है। इसमें आंखों की पुतलियों की प्रतिक्रिया, शारीरिक रिफ्लेक्स और सांस लेने की क्षमता की गहन जांच की जाती है। इसके साथ ही डॉक्टर यह भी सुनिश्चित करते हैं कि मरीज के शरीर में किसी नशीली दवा का असर या कोई अन्य अस्थाई प्रभाव तो नहीं है। जब शत-प्रतिशत यह पुष्टि हो जाती है कि मरीज ब्रेन डेड हो चुका है, तब अंगदान की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ती है। यदि मरीज ने अपने जीवनकाल में अंगदान का संकल्प लिया हो या फिर उसका परिवार इसके लिए सहमति प्रदान करे, तभी ट्रांसप्लांट समन्वय टीम अपना काम शुरू करती है।

सहमति मिलने के बाद मेडिकल टीम डोनर के सभी अंगों की कार्यक्षमता का गहनता से परीक्षण करती है। मरीज का पूरा मेडिकल इतिहास, ब्लड ग्रुप और इन्फेक्शन की जांच की जाती है ताकि यह तय हो सके कि कौन से अंग सुरक्षित और प्रत्यारोपण योग्य हैं। अंग सही पाए जाने पर उनकी जानकारी केंद्रीकृत ऑर्गन अलॉटमेंट सिस्टम में दर्ज कर दी जाती है। यह प्रणाली बेहद पारदर्शी तरीके से काम करती है। इसमें केवल पहले पंजीकरण कराने के आधार पर अंग नहीं मिलता, बल्कि प्राप्तकर्ता के ब्लड ग्रुप का मिलान, बीमारी की गंभीरता और प्रतीक्षा सूची में बिताए गए समय जैसे मानकों को ध्यान में रखकर प्रणाली खुद प्राप्तकर्ता का चयन करती है। इस पूरी प्रक्रिया में गोपनीयता का विशेष ध्यान रखा जाता है ताकि बंटवारा पूरी तरह निष्पक्ष और सुरक्षित रहे।

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