भारतीय वैज्ञानिकों की बड़ी सफलता, नई तकनीक से इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी की उम्र बढ़ाने का दावा

भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग के बीच उनकी सबसे बड़ी चुनौती बैटरी की लाइफ और परफॉर्मेंस बनी हुई है। अब इस समस्या का समाधान खोजने की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक नई हाइब्रिड ऊर्जा भंडारण प्रणाली विकसित की है, जो इलेक्ट्रिक वाहन की बैटरी पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को कम करने में मदद करती है। इस नई तकनीक को पेटेंट भी मिल चुका है और इसे भविष्य में इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग के लिए उपयोगी माना जा रहा है।
बैटरी पर अचानक पड़ने वाले दबाव का समाधान
शहरों में चलने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों को बार-बार रुकना, चलना, तेज गति पकड़ना और अचानक ब्रेक लगाना पड़ता है। इन परिस्थितियों में बैटरी से बहुत तेजी से बिजली ली जाती है या वापस भेजी जाती है। इससे बैटरी सेल्स पर थर्मल और इलेक्ट्रिकल दबाव बढ़ जाता है, जिससे समय के साथ बैटरी की क्षमता और उम्र प्रभावित हो सकती है।
नई तकनीक इसी चुनौती को ध्यान में रखकर तैयार की गई है ताकि बैटरी को अचानक आने वाले करंट के झटकों से बचाया जा सके।
बैटरी के साथ सुपरकैपेसिटर का इस्तेमाल
शोधकर्ताओं ने इस नई प्रणाली में बैटरी के साथ सुपरकैपेसिटर को जोड़ा है। सुपरकैपेसिटर बहुत कम समय में तेजी से चार्ज और डिस्चार्ज हो सकता है। जब वाहन को अचानक अधिक ऊर्जा की जरूरत होती है, तो सुपरकैपेसिटर उस अतिरिक्त मांग को संभाल लेता है। इससे बैटरी पर सीधा दबाव कम पड़ता है और उसकी कार्यक्षमता बेहतर बनी रहती है।
सरल डिजाइन बनी सबसे बड़ी खासियत
इस हाइब्रिड ऊर्जा भंडारण प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता इसका सरल और कम जटिल डिजाइन है। इसमें केवल तीन प्रमुख घटकों का उपयोग किया गया है।
- एक कन्वर्टर।
- एक इंडक्टर।
- एक सिंगल कंट्रोल सिस्टम।
एक ही कन्वर्टर बैटरी और सुपरकैपेसिटर दोनों को वाहन की विद्युत प्रणाली से जोड़ता है। इससे अतिरिक्त स्विच और कंट्रोल यूनिट की जरूरत कम हो जाती है, जिससे सिस्टम अधिक कॉम्पैक्ट और प्रभावी बनता है।
परीक्षण में मिले सकारात्मक परिणाम
शोधकर्ताओं ने इस तकनीक का परीक्षण कई वास्तविक परिस्थितियों में किया। इसमें अचानक ब्रेक लगाना, तेज एक्सीलरेशन, धीमी गति और लगातार गति बदलने जैसी स्थितियां शामिल थीं। परीक्षण के दौरान सिस्टम ने 48 वोल्ट का स्थिर वोल्टेज बनाए रखा और बैटरी करंट में अचानक आने वाले उतार-चढ़ाव को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया। सुपरकैपेसिटर ने अतिरिक्त ऊर्जा की मांग को भी प्रभावी ढंग से संभाला।
किन वाहनों में होगी सबसे ज्यादा उपयोगी?
यह तकनीक विशेष रूप से 24 से 60 वोल्ट डीसी प्लेटफॉर्म वाले कम वोल्टेज इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए तैयार की गई है। इसका उपयोग इलेक्ट्रिक स्कूटर, इलेक्ट्रिक मोटरसाइकिल, ई-रिक्शा, कार्गो ट्राइसाइकिल और कैंपस या औद्योगिक उपयोगिता वाहनों में किया जा सकता है।
इसके अलावा यह तकनीक वेयरहाउस कार्ट, स्वचालित निर्देशित वाहन (AGV), डीसी माइक्रोग्रिड और नवीकरणीय ऊर्जा आधारित चार्जिंग स्टेशनों में भी उपयोगी साबित हो सकती है।
ईवी उद्योग के लिए क्यों है बड़ी उपलब्धि?
भारत में इलेक्ट्रिक वाहन बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है। ऐसे में बैटरी की उम्र बढ़ाने वाली यह तकनीक ईवी मालिकों के लिए लंबे समय में बैटरी बदलने की लागत कम कर सकती है। साथ ही वाहनों की विश्वसनीयता, ऊर्जा दक्षता और प्रदर्शन में भी सुधार की संभावना है।
अब उद्योग के साथ सहयोग की तैयारी
पेटेंट मिलने के बाद यह तकनीक अब इलेक्ट्रिक वाहन निर्माताओं, पावरट्रेन सिस्टम इंटीग्रेटर्स, फ्लीट ऑपरेटरों और ईवी रेट्रोफिट स्टार्टअप्स के साथ सहयोग के लिए तैयार है। यदि इसका व्यावसायिक उपयोग शुरू होता है, तो यह भारतीय ईवी उद्योग में बैटरी तकनीक के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव ला सकती है।
