भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में सबसे कम बढ़ोतरी, दुनिया के कई देशों में 50% तक महंगा हुआ ईंधन

भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हाल ही में हुई बढ़ोतरी को लेकर वैश्विक स्तर पर तुलना की जा रही है। आंकड़ों के अनुसार भारत में ईंधन की कीमतों में 3.91 रुपए प्रति लीटर यानी करीब 4.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी कम मानी जा रही है। कई देशों में जहां पेट्रोल और डीजल की कीमतें 50 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं, वहीं भारत में सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने लंबे समय तक उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ नहीं डाला।
जानकारी के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को करीब 76 दिनों तक स्थिर रखा गया। इस दौरान सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां लगातार भारी वित्तीय दबाव झेलती रहीं। तेल कंपनियों ने बढ़ी हुई लागत का बड़ा हिस्सा खुद वहन किया ताकि आम लोगों को राहत मिल सके। बाद में कीमतों में 3.91 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई, लेकिन इससे भी कंपनियों के कुल नुकसान की केवल आंशिक भरपाई हो पाई।
दुनिया के कई देशों में ईंधन की कीमतों में कहीं ज्यादा तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पाकिस्तान, मलेशिया, म्यांमार और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में पेट्रोल की कीमतें युद्ध-पूर्व स्तर की तुलना में 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ चुकी हैं। डीजल की कीमतों में तो और भी ज्यादा वृद्धि हुई है क्योंकि इसका सीधा संबंध वैश्विक व्यापार और माल ढुलाई से होता है। पाकिस्तान में उपभोक्ताओं को तीन महीने पहले की तुलना में लगभग 55 प्रतिशत अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है, जबकि मलेशिया और यूएई में भी ईंधन बेहद महंगा हो चुका है।
विकसित देशों की बात करें तो अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में करीब 45 प्रतिशत और डीजल में 48 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों में भी पेट्रोल और डीजल दोनों के दाम तेजी से बढ़े हैं। फ्रांस में डीजल की कीमतों में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि जर्मनी और ब्रिटेन में भी आम लोगों पर ईंधन महंगाई का बड़ा असर देखने को मिला। एशियाई देशों में जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर में पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन डीजल वहां भी काफी महंगा हुआ है।
भारत की सार्वजनिक तेल कंपनियों पर इस दौरान भारी वित्तीय दबाव पड़ा। इंडियन ऑयल के अधिकारियों के अनुसार, कच्चे तेल की महंगी कीमतों के कारण कंपनियों को पहले प्रतिदिन करीब 1,000 करोड़ रुपए तक का नुकसान हो रहा था। हालिया मूल्य वृद्धि के बाद यह नुकसान घटकर लगभग 750 करोड़ रुपए प्रतिदिन रह गया है। यानी कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति पूरी तरह संतुलित नहीं हो सकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने वैश्विक तेल संकट के दौरान संतुलित नीति अपनाई है। सरकार ने एक तरफ उपभोक्ताओं को राहत देने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर तेल कंपनियों के नुकसान को सीमित रखने का प्रयास भी किया। आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों की दिशा ही तय करेगी कि घरेलू ईंधन कीमतों में आगे और बदलाव होगा या नहीं।
