रावी–ब्यास जल विवाद पर केंद्र सक्रिय, तीन दिन तक हरियाणा-पंजाब के दावों की जांच करेगा ट्रिब्यूनल
पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच लंबे समय से चले आ रहे रावी और ब्यास नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर केंद्र सरकार ने एक बार फिर सक्रियता दिखाई है। इस विवाद की वास्तविक स्थिति और राज्यों के दावों की गहराई से जांच करने के लिए रावी और ब्यास जल ट्रिब्यूनल की छह सदस्यीय टीम शुक्रवार से चंडीगढ़ में तीन दिवसीय दौरे पर पहुंच रही है। ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष जस्टिस विनीत सरन के नेतृत्व में यह टीम जमीनी हालात का निरीक्षण करेगी और कानूनी पहलुओं का भी अवलोकन करेगी।
रावी और ब्यास नदियों के जल बंटवारे को लेकर केंद्र सरकार ने वर्ष 1986 में इस ट्रिब्यूनल का गठन किया था, लेकिन वर्षों से यह मामला राजनीतिक और कानूनी उलझनों में फंसा हुआ है। खास तौर पर सतलुज-यमुना लिंक नहर को लेकर मतभेद इस विवाद की बड़ी वजह बने हुए हैं। हरियाणा का कहना है कि उसे अपने निर्धारित हिस्से के अनुसार 3.5 मिलियन एकड़ फीट पानी मिलना चाहिए, जबकि वर्तमान में उसे लगभग 1.88 एमएएफ पानी ही मिल पा रहा है। इसी अंतर को लेकर हरियाणा लगातार आपत्ति जताता रहा है।
तीन दिवसीय दौरे के दौरान ट्रिब्यूनल की टीम सबसे पहले पंजाब के रोपड़ जिले में स्थित लोहड़ हेड का निरीक्षण करेगी। यहां यह देखा जाएगा कि भाखड़ा प्रणाली के तहत हरियाणा को वास्तव में कितना पानी मिल रहा है। इसके बाद शनिवार को टीम कुरुक्षेत्र के बुडेढ़ा हेड पहुंचेगी, जहां पंजाब से भाखड़ा के माध्यम से हरियाणा को दी जा रही जल आपूर्ति की स्थिति का जायजा लिया जाएगा। इसी क्रम में पश्चिमी यमुना नहर प्रणाली से मिलने वाले पानी का भी विवरण जुटाया जाएगा।
दौरे के अंतिम दिन रविवार को ट्रिब्यूनल करनाल स्थित मुनक हेड का निरीक्षण करेगा। मुनक हेड से दिल्ली को भी पानी की आपूर्ति की जाती है, इसलिए इसका निरीक्षण इस विवाद में एक अहम कड़ी माना जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान ट्रिब्यूनल के साथ हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के वरिष्ठ अधिकारी, सिंचाई विभाग के प्रतिनिधि और कानूनी विशेषज्ञ मौजूद रहेंगे। इसके अलावा दिल्ली जल बोर्ड और केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अधिकारी भी इस दौरे का हिस्सा होंगे।
हरियाणा की ओर से मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ट्रिब्यूनल के समक्ष राज्य का पक्ष मजबूती से रखेंगे। हरियाणा ने इसके लिए सात कानूनी विशेषज्ञों की टीम तैयार की है। वहीं पंजाब भी अपने दावे के समर्थन में कानूनी और तकनीकी तर्क पेश करेगा। दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच हाल ही में हुई बैठक में यह सहमति बनी थी कि एसवाईएल नहर के निर्माण से पहले पानी के बंटवारे पर स्पष्ट फैसला होना जरूरी है।
कुल मिलाकर यह दौरा रावी-ब्यास जल विवाद के समाधान की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। ट्रिब्यूनल की रिपोर्ट और सिफारिशें आने वाले समय में केंद्र और राज्यों के लिए निर्णय का आधार बन सकती हैं, जिससे वर्षों से चला आ रहा यह संवेदनशील जल विवाद किसी ठोस नतीजे तक पहुंच सके।
