सरकार ने बदला ईंधन निर्यात शुल्क, डीजल और एटीएफ पर टैक्स बढ़ा, पेट्रोल पर मिली राहत

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सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर लगने वाले विशेष अतिरिक्त सीमा शुल्क की नवीनतम समीक्षा के बाद नई दरें लागू कर दी हैं। इस फैसले के तहत डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) के निर्यात पर लगने वाले कर में बढ़ोतरी की गई है, जबकि पेट्रोल के निर्यात पर शुल्क में राहत दी गई है। संशोधित दरें तत्काल प्रभाव से लागू हो गई हैं और इनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति तथा देश में ईंधन की उपलब्धता के बीच संतुलन बनाए रखना है।

नई व्यवस्था के अनुसार अब डीजल के निर्यात पर विशेष अतिरिक्त सीमा शुल्क बढ़ाकर 15.50 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इसी तरह एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी एटीएफ के निर्यात पर शुल्क बढ़ाकर 14.50 रुपये प्रति लीटर निर्धारित किया गया है। दूसरी ओर पेट्रोल के निर्यात पर कर घटाकर 2.50 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। यह बदलाव अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों और कच्चे तेल की कीमतों में आए उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखते हुए किया गया है।

हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि घरेलू उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध कराए जाने वाले पेट्रोल और डीजल पर किसी प्रकार का अतिरिक्त निर्यात शुल्क लागू नहीं किया गया है। इसका अर्थ यह है कि देश के भीतर उपयोग होने वाले ईंधन की मौजूदा व्यवस्था पहले की तरह जारी रहेगी और इस निर्णय का सीधा असर केवल निर्यात होने वाले पेट्रोलियम उत्पादों पर पड़ेगा।

विशेष अतिरिक्त सीमा शुल्क की व्यवस्था इस वर्ष 27 मार्च से लागू की गई थी। उस समय पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताओं को देखते हुए यह फैसला लिया गया था ताकि पेट्रोलियम उत्पादों का अत्यधिक निर्यात रोका जा सके और घरेलू बाजार में पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का असर देश के ईंधन आपूर्ति तंत्र पर न्यूनतम पड़े और आम उपभोक्ताओं को किसी प्रकार की कमी का सामना न करना पड़े।

सरकार इस विशेष अतिरिक्त सीमा शुल्क की समीक्षा प्रत्येक दो सप्ताह में करती है। समीक्षा के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल, पेट्रोल, डीजल और एटीएफ की औसत कीमतों का विस्तृत विश्लेषण किया जाता है। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर यह तय किया जाता है कि निर्यात शुल्क में बदलाव की आवश्यकता है या नहीं। यदि वैश्विक बाजार में कीमतों में उल्लेखनीय परिवर्तन होता है तो उसी के अनुरूप शुल्क दरों में संशोधन किया जाता है।

ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि इस प्रकार की नियमित समीक्षा से सरकार को बाजार की बदलती परिस्थितियों के अनुसार त्वरित निर्णय लेने में सुविधा मिलती है। इससे एक ओर घरेलू ईंधन आपूर्ति सुरक्षित रहती है तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा बाजार की स्थिति के अनुरूप नीतियों में आवश्यक लचीलापन भी बना रहता है। आने वाले समय में भी वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर इन शुल्क दरों में आगे बदलाव संभव माना जा रहा है।

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