पीएम मोदी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन को भेंट किया तिरुक्कुरल का रूसी अनुवाद, भारतीय संस्कृति का वैश्विक डंका

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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सांस्कृतिक कूटनीति की मिसाल

नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान कूटनीतिक वार्ताओं के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और विरासत को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का एक बेहतरीन नजारा देखने को मिला। भारतीय प्रधानमंत्री ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को महान तमिल ग्रंथ तिरुक्कुरल का रूसी अनुवाद भेंट किया। यह कदम भारतीय साहित्य, दर्शन और प्राचीन ज्ञान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलाने की एक अनूठी पहल के रूप में देखा जा रहा है।

तिरुक्कुरल का शाश्वत ज्ञान और इसका वैश्विक महत्व

तिरुक्कुरल तमिल साहित्य और दर्शन की एक कालजयी रचना है, जिसकी रचना महान संत और दार्शनिक तिरुवल्लुवर ने की थी। इस ग्रंथ में नैतिकता, धर्म, राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रेम जैसे जीवन के विविध पहलुओं पर विचार प्रस्तुत किए गए हैं। इसका रूसी भाषा में अनुवाद रूसी राष्ट्रपति को भेंट करना यह दर्शाता है कि भारत अपने प्राचीन ज्ञान और नैतिक मूल्यों को भाषाई सीमाओं से पार ले जाकर दुनिया के सामने मजबूती से रख रहा है।

भारतीय साहित्य को वैश्विक पाठकों तक पहुंचाने के प्रयास

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय भाषाओं और क्षेत्रीय साहित्य को पहचान दिलाने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं। पूर्व में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के दौरान भी आधुनिक और क्लासिक भारतीय कृतियों को रूसी, चीनी और अंग्रेजी भाषाओं में अनुवादित कराने की विशेष पहल की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य देश के विभिन्न हिस्सों में रचे गए समृद्ध साहित्य को दुनिया भर के पाठकों के लिए सुलभ बनाना था।

कोविड काल के दौरान भी जारी रही अनुवाद की मुहिम

विदेश मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय के समन्वय से कई प्रमुख पुस्तकों की सूची तैयार की गई थी, जिनका अनुवाद तीन प्रमुख वैश्विक भाषाओं में किया गया। वर्चुअल माध्यम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भी इन पुस्तकों का विमोचन कर यह संदेश दिया गया था कि भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों और साहित्यिक धरोहर को लेकर कितना गंभीर है। यह नीति भारतीय संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने में काफी मददगार साबित हो रही है।

भगवद्गीता के बाद अब तिरुक्कुरल की भेंट

यह पहला मौका नहीं है जब रूसी राष्ट्रपति को कोई ऐतिहासिक भारतीय ग्रंथ उपहार में दिया गया हो। इससे पूर्व 2025 में उनकी भारत यात्रा के दौरान भगवद्गीता का रूसी संस्करण भी उन्हें भेंट किया गया था। इस तरह के सांस्कृतिक आदान-प्रदान न केवल दो देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करते हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ और सांस्कृतिक प्रभाव को भी नए आयाम प्रदान करते हैं।

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