मन की बात में पीएम मोदी का संदेश: अशोक सिंघल की जयंती पर नमन और सोमनाथ-मोढेरा मंदिर के स्वाभिमान की गाथा

राष्ट्र सेवा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के महानायक का स्मरण
रेडियो के लोकप्रिय कार्यक्रम की 138वीं कड़ी में देशवासियों को संबोधित करते हुए एक ऐसी महान विभूति को याद किया गया, जिन्होंने अपना पूरा जीवन संस्कृति, समाज और राष्ट्र की सेवा में समर्पित कर दिया। 27 सितंबर की तारीख ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन आगरा में एक ऐसी शख्सियत का जन्म हुआ था, जिन्होंने आगे चलकर देश की सांस्कृतिक चेतना को जगाने में अभूतपूर्व भूमिका निभाई। एक संपन्न परिवार में जन्म लेने और उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद उन्होंने सुख-सुविधाओं का त्याग कर समाज सेवा का मार्ग चुना।
वे विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष स्वर्गीय अशोक सिंघल थे, जिनकी 100वीं जन्मजयंती के अवसर पर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई। उनके पिता एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी थे और परिवार के अन्य सदस्य भी बड़े पदों पर आसीन थे। वे स्वयं आईआईटी बीएचयू से स्नातक थे, लेकिन भौतिक साधनों के बजाय उन्होंने समाज के निचले स्तर तक जाकर लोगों को जोड़ने का कार्य किया। उन्होंने अपना पूरा जीवन एक निष्काम तपस्वी की भांति व्यतीत किया।
राम मंदिर आंदोलन और सामाजिक समरसता का संकल्प
अशोक सिंघल ने राम जन्मभूमि आंदोलन को जो मजबूत दिशा और असीम ऊर्जा प्रदान की, उसी का परिणाम है कि आज अयोध्या में एक भव्य और अलौकिक मंदिर का निर्माण साकार हो सका है। अयोध्या में श्री राम लला की प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक अवसरों पर उनके अतुलनीय योगदान का स्मरण होना स्वाभाविक था। उन्होंने न केवल इस आंदोलन का नेतृत्व किया, बल्कि इसके माध्यम से समाज को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास भी किया।
उनके व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह था कि उन्होंने राम मंदिर आंदोलन के साथ-साथ सामाजिक भेदभाव और विषमता के खिलाफ भी एक लंबी लड़ाई लड़ी। वे मानते थे कि एक मजबूत और संगठित समाज ही राष्ट्र की रक्षा कर सकता है। इसी सोच के साथ उन्होंने समाज के हर वर्ग को एकजुट करने और कुरीतियों को समाप्त करने के लिए निरंतर काम किया।
सोमनाथ मंदिर और भारत के स्वाभिमान का एक हजार वर्षों का सफर
अपने संबोधन के दौरान इतिहास के एक और गौरवशाली तथा संघर्षपूर्ण अध्याय की चर्चा की गई। इस वर्ष सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का विशेष महत्व रहा क्योंकि आज से ठीक एक हजार वर्ष पूर्व 1026 में विदेशी आक्रांता मोहम्मद गजनी ने सोमनाथ मंदिर को ध्वस्त करने का प्रयास किया था। आक्रांताओं की मंशा भारत की आध्यात्मिक पहचान और सांस्कृतिक जड़ों को मिटाने की थी, लेकिन इतिहास गवाह है कि वे अपने मंसूबों में पूरी तरह सफल नहीं हो सके।
आज जिन लोगों ने भारत की आस्था पर हमला किया था, इतिहास में उनका कोई नामोनिशान नहीं बचा है, जबकि पवित्र सोमनाथ मंदिर पूरे गौरव और भव्यता के साथ अरब सागर के तट पर खड़ा है। यह मंदिर भारत की अमरता और अटूट आस्था का प्रतीक बनकर देशवासियों को आशीर्वाद दे रहा है। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि भारत की सांस्कृतिक जड़ें कितनी गहरी और अटूट हैं।
मोढेरा सूर्य मंदिर और पुनर्निर्माण की ऐतिहासिक जीवटता
सोमनाथ पर हुए आक्रमण के उसी दौर में गुजरात के प्रसिद्ध मोढेरा सूर्य मंदिर पर भी भारी हमला हुआ था। इस भव्य मंदिर का निर्माण राजा भीमदेव प्रथम ने 1025 में कराया था और इसके निर्माण के महज एक वर्ष बाद ही इस पर आक्रमण कर इसे क्षति पहुंचाई गई थी। आस्था के इतने बड़े केंद्रों पर लगातार हुए हमलों से किसी भी समाज या साम्राज्य का मनोबल टूट सकता था, लेकिन भारतीय समाज की जीवटता ने हार नहीं मानी।
राजा भीमदेव प्रथम ने न केवल विदेशी आक्रमणकारियों का पूरी हिम्मत से मुकाबला किया, बल्कि बेहद कम समय में मोढेरा के सूर्य मंदिर का पुनरुद्धार भी करवा दिया। कालखंड बीतने के साथ अलाउद्दीन खिलजी जैसे बाद के शासकों ने भी इस वास्तुकला के चमत्कार को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन भारत के लोगों का अपनी परंपराओं और उपासना पद्धतियों के प्रति विश्वास कभी कम नहीं हुआ।
प्राचीन वास्तुकला से आधुनिक सौर ऊर्जा का नया केंद्र
भारत में सूर्य की उपासना केवल धार्मिक अनुष्ठानों या वास्तुकला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकाश, ऊर्जा, विज्ञान और निरंतरता का भी प्रतीक है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए मोढेरा आज केवल एक ऐतिहासिक सूर्य मंदिर के रूप में ही नहीं जाना जाता, बल्कि यह देश का पहला पूर्ण सौर ऊर्जा संचालित गांव यानी सोलर विलेज बन चुका है।
आज मोढेरा गांव अपनी दैनिक ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर निर्भर है, जो पूरे देश के सामने सतत विकास का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है। पर्यटकों के लिए यहां आधुनिक सुविधाएं विकसित की गई हैं और हर साल जनवरी में मकर संक्रांति के बाद आयोजित होने वाला मोढेरा नृत्य महोत्सव भारत के शास्त्रीय नृत्यों का सुंदर प्रदर्शन करता है। यह स्थान इतिहास और आधुनिकता का एक अनोखा संगम बनकर उभरा है।
