राजद में तेजस्वी यादव की ताजपोशी, परिवारवाद पर फिर खड़े हुए बड़े सवाल

राष्ट्रीय जनता दल ने लंबे समय से चल रही अटकलों पर विराम लगाते हुए तेजस्वी यादव को पार्टी का कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया है। यह फैसला पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की मौजूदगी में लिया गया और तेजस्वी यादव की ताजपोशी भी उन्हीं के हाथों संपन्न हुई। यह दृश्य भारतीय राजनीति में कोई नई कहानी नहीं था, बल्कि वही पुरानी तस्वीर एक बार फिर सामने आई, जिसमें सत्ता, संगठन और उत्तराधिकार एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटे नजर आते हैं। राजद के लिए यह फैसला भले ही अपेक्षित माना जा रहा हो, लेकिन इसने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि आखिर क्षेत्रीय राजनीतिक दल परिवारवाद की परिधि से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहे हैं।
तेजस्वी यादव के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर राजनीतिक जानकारों की प्रतिक्रिया लगभग एक जैसी रही। उनका कहना है कि जो होना तय था, वही हुआ। लालू प्रसाद यादव के खराब स्वास्थ्य और सक्रिय राजनीति से दूरी के बाद यह लगभग स्पष्ट हो चुका था कि पार्टी की कमान तेजस्वी यादव को ही सौंपी जाएगी। राजद के भीतर वर्षों में ऐसा कोई वैकल्पिक नेता तैयार नहीं किया गया, जो राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व का दावा कर सके। पार्टी की संगठनात्मक संरचना, चुनावी रणनीति और राजनीतिक पहचान लंबे समय से लालू परिवार के नाम पर ही टिकी रही है। ऐसे में तेजस्वी यादव की ताजपोशी किसी बड़े राजनीतिक फैसले से ज्यादा एक औपचारिक प्रक्रिया जैसी ही दिखाई दी।
हालांकि इसी घटनाक्रम के बीच भारतीय राजनीति में एक और उदाहरण चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसने इस फैसले को और भी सवालों के घेरे में ला दिया है। हाल में भारतीय जनता पार्टी के एक बड़े संगठनात्मक कदम ने पूरी राजनीतिक बिरादरी को सोचने पर मजबूर किया है। यह उदाहरण क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय दलों के बीच नेतृत्व चयन की सोच और कार्यप्रणाली के फर्क को उजागर करता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिवारवाद कई क्षेत्रीय दलों के लिए अब सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि संगठनात्मक कमजोरी के कारण एक मजबूरी बन चुका है। जब नेतृत्व विकसित करने की प्रक्रिया सीमित रह जाती है, तब सत्ता की बागडोर बार-बार एक ही परिवार को सौंप दी जाती है। तेजस्वी यादव की ताजपोशी ने इसी सियासी हकीकत को एक बार फिर सामने ला दिया है।
