बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार ने पार्टी के भीतर बड़े स्तर पर आत्ममंथन की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस हाईकमान ने क्षेत्रीय नेतृत्व से लेकर स्थानीय स्तर के सभी उम्मीदवारों तक को दिल्ली तलब किया है। सभी से विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है, ताकि यह समझा जा सके कि हार की असली वजहें क्या रहीं। हालांकि सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या हार की जिम्मेदारी सिर्फ उम्मीदवारों पर डाल देना ठीक है? क्या संगठन, रणनीति और नेतृत्व स्तर पर हुई गलतियों पर भी जवाबदेही तय होगी?
चुनावों में जीत का जश्न अक्सर तेजी से मनाया जाता है, लेकिन हार के बाद होने वाली समीक्षा बैठकें कहीं ज्यादा कठिन होती हैं। इस समय बिहार के महागठबंधन खेमे में हालात बिल्कुल ऐसे ही हैं। राजद नेता तेजस्वी यादव लगातार समीक्षा बैठकों में व्यस्त हैं और गठबंधन के प्रदर्शन पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। वहीं कांग्रेस अपने अंदरूनी ढांचे, अभियान की मजबूती, संगठन की पहुंच और सीटों के चयन जैसी रणनीतियों पर नए सिरे से विचार कर रही है।
चुनाव प्रचार के दौरान कई सीटों पर कांग्रेस की उपस्थिति कमजोर मानी गई, जबकि कई जगह संगठन के सक्रिय न होने की भी शिकायतें सामने आईं। रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि कई उम्मीदवारों को पर्याप्त स्थानीय समर्थन नहीं मिला और कई क्षेत्रों में बूथ-स्तरीय तैयारियां कमजोर रहीं। गठबंधन के भीतर तालमेल और साझा रणनीति का अभाव भी एक बड़ी वजह के रूप में सामने आया है।
अब कांग्रेस हाईकमान की कोशिश यह जानने की है कि क्या हार सिर्फ उम्मीदवारों की कमियों की वजह से हुई या फिर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और संगठनात्मक रणनीति में भी गंभीर खामियां थीं। आने वाले दिनों में इन रिपोर्टों के आधार पर बड़े फैसले लिए जा सकते हैं।
