राष्ट्रीय इस्पात नीति-विजन 2047 का मसौदा तैयार, भारत का स्टील उत्पादन बढ़ाने की बड़ी तैयारी

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भारत ने अपने इस्पात उद्योग को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाने और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय इस्पात नीति-विजन 2047 का मसौदा तैयार किया है। इस दीर्घकालिक नीति का उद्देश्य देश को इस्पात उत्पादन के क्षेत्र में अधिक प्रतिस्पर्धी, तकनीकी रूप से उन्नत, पर्यावरण के अनुकूल और संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने वाला बनाना है। इसके तहत वर्ष 2047 तक कच्चे इस्पात की उत्पादन क्षमता को लगभग तीन गुना बढ़ाने, तैयार इस्पात की मांग को विस्तार देने और निर्यात में बड़ी वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है। इस पहल को भारत के बुनियादी ढांचे, विनिर्माण और औद्योगिक विकास की दीर्घकालिक जरूरतों से जोड़कर देखा जा रहा है।

राष्ट्रीय इस्पात नीति-विजन 2047 का मुख्य उद्देश्य

राष्ट्रीय इस्पात नीति-विजन 2047 का मसौदा देश के इस्पात क्षेत्र के लिए एक व्यापक नीतिगत दिशा तय करता है। इसका मकसद केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि भारतीय इस्पात उद्योग को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक सक्षम बनाना भी है।

इस्पात का इस्तेमाल सड़क, रेलवे, पुल, आवास, औद्योगिक संयंत्र, वाहन निर्माण और ऊर्जा परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर होता है। जैसे-जैसे देश में बुनियादी ढांचे का विस्तार होगा, वैसे-वैसे इस्पात की मांग बढ़ने की संभावना है। इसलिए भविष्य की जरूरतों के अनुसार उत्पादन क्षमता विकसित करना इस नीति का प्रमुख हिस्सा है।

इसके साथ ही उद्योग में आधुनिक तकनीक अपनाने, ऊर्जा की खपत कम करने, संसाधनों का कुशल उपयोग करने और उत्पादन प्रक्रिया को पर्यावरण के अनुकूल बनाने पर जोर दिया गया है।

भारत में प्रति व्यक्ति इस्पात खपत में बढ़ोतरी

देश में इस्पात की खपत में पिछले वर्षों के दौरान उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। नीति के मसौदे के अनुसार, भारत में प्रति व्यक्ति इस्पात खपत 116 किलोग्राम से बढ़कर 302 किलोग्राम हो गई है। यह वृद्धि देश में निर्माण गतिविधियों, औद्योगिक उत्पादन और बुनियादी ढांचे की बढ़ती जरूरतों को दर्शाती है।

प्रति व्यक्ति इस्पात खपत किसी देश में औसतन एक व्यक्ति के हिस्से आने वाली इस्पात खपत का संकेत देती है। इसमें बढ़ोतरी का संबंध आवास निर्माण, परिवहन व्यवस्था, औद्योगिक विकास और विभिन्न विकास परियोजनाओं से हो सकता है।

आने वाले वर्षों में शहरीकरण, नए औद्योगिक गलियारों, रेलवे नेटवर्क, सड़क परियोजनाओं और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश से इस्पात की मांग को और समर्थन मिल सकता है। हालांकि, वास्तविक मांग आर्थिक विकास, निवेश और बाजार की परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगी।

2014-15 से 2025-26 तक बढ़ा कच्चे इस्पात का उत्पादन

भारत के इस्पात उद्योग ने उत्पादन के मामले में भी उल्लेखनीय विस्तार दर्ज किया है। मसौदे में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2014-15 में देश का कच्चे इस्पात का उत्पादन 8 करोड़ 9 लाख टन था। यह बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 17 करोड़ टन हो गया।

इस वृद्धि से भारतीय इस्पात क्षेत्र की बढ़ती उत्पादन क्षमता और घरेलू बाजार के विस्तार का पता चलता है। कच्चे इस्पात का इस्तेमाल आगे विभिन्न प्रकार के तैयार इस्पात उत्पाद बनाने के लिए किया जाता है, जिनकी जरूरत निर्माण, मशीनरी, ऑटोमोबाइल और अन्य उद्योगों में होती है।

उत्पादन में आगे वृद्धि के लिए नई औद्योगिक इकाइयों, आधुनिक संयंत्रों, बेहतर लॉजिस्टिक्स और कच्चे माल की उपलब्धता की अहम भूमिका रहेगी। साथ ही, भारतीय कंपनियों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच गुणवत्ता और लागत पर भी ध्यान देना होगा।

2047 तक 60.40 करोड़ टन उत्पादन क्षमता का लक्ष्य

राष्ट्रीय इस्पात नीति-विजन 2047 के मसौदे में सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य कच्चे इस्पात की उत्पादन क्षमता को बढ़ाना है। इसके तहत वर्ष 2047 तक भारत की कच्चे इस्पात की उत्पादन क्षमता लगभग 60 करोड़ 40 लाख टन तक पहुंचाने की परिकल्पना की गई है।

यह लक्ष्य मौजूदा उत्पादन स्तर की तुलना में बड़े औद्योगिक विस्तार की मांग करता है। इसके लिए इस्पात संयंत्रों का विस्तार, नई उत्पादन इकाइयों की स्थापना और आधुनिक तकनीकों में निवेश आवश्यक होगा।

उत्पादन क्षमता और वास्तविक उत्पादन में अंतर होता है। क्षमता यह बताती है कि उद्योग अधिकतम कितना उत्पादन कर सकता है, जबकि वास्तविक उत्पादन संयंत्रों के इस्तेमाल, बाजार की मांग और परिचालन स्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए निर्धारित क्षमता हासिल करने के साथ उसका प्रभावी उपयोग भी महत्वपूर्ण होगा।

तैयार इस्पात की मांग 50.50 करोड़ टन तक पहुंचाने की योजना

मसौदे में वर्ष 2047 तक तैयार इस्पात की मांग को 50 करोड़ 50 लाख टन तक बढ़ाने का लक्ष्य भी रखा गया है। तैयार इस्पात का इस्तेमाल सीधे तौर पर निर्माण और विनिर्माण की कई गतिविधियों में होता है।

आवास परियोजनाओं, पुलों, राजमार्गों, रेलवे, मेट्रो नेटवर्क, बंदरगाहों और औद्योगिक सुविधाओं के निर्माण में तैयार इस्पात की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके अलावा वाहन निर्माण, मशीनरी, घरेलू उपकरण और नवीकरणीय ऊर्जा से जुड़ी परियोजनाओं में भी इसकी जरूरत पड़ती है।

मांग बढ़ने से उद्योग को विस्तार के अवसर मिल सकते हैं। हालांकि, इसके लिए घरेलू उत्पादन, वितरण नेटवर्क और अंतिम उपभोक्ताओं की जरूरतों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा।

इस्पात निर्यात को 4.5 करोड़ टन तक बढ़ाने का अनुमान

भारत की इस्पात नीति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में देश की स्थिति मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है। मसौदे के अनुसार, वर्ष 2047 तक इस्पात निर्यात को साढ़े चार करोड़ टन तक बढ़ाने का अनुमान है।

निर्यात में वृद्धि से भारतीय कंपनियों को नए बाजारों तक पहुंच बनाने और विदेशी मांग का लाभ उठाने का अवसर मिल सकता है। लेकिन वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा के लिए उत्पादों की गुणवत्ता, उत्पादन लागत, परिवहन खर्च और पर्यावरण संबंधी मानकों का पालन करना महत्वपूर्ण होगा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्पात की कीमतों और व्यापार नीतियों में होने वाले बदलाव भी निर्यात की संभावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए दीर्घकालिक निर्यात लक्ष्य को हासिल करने के लिए उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत करना जरूरी होगा।

ग्रीन स्टील और कार्बन उत्सर्जन कम करने पर जोर

इस नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू स्वच्छ इस्पात उत्पादन को बढ़ावा देना है। इस्पात निर्माण में ऊर्जा की बड़ी मात्रा इस्तेमाल होती है और पारंपरिक उत्पादन प्रक्रियाओं से कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन भी होता है।

मसौदे में कच्चे इस्पात के प्रति टन औसतन 2.5 से 4 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को वर्ष 2047 तक घटाकर 1.5 से 4 टन के स्तर तक लाने का लक्ष्य बताया गया है। इससे संकेत मिलता है कि उत्पादन बढ़ाने के साथ पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना भी नीति की प्राथमिकताओं में शामिल है।

स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा-कुशल तकनीक, बेहतर उत्पादन प्रक्रियाओं और संसाधनों के पुनर्चक्रण से उत्सर्जन घटाने में मदद मिल सकती है। इसके लिए कंपनियों को नई तकनीकों और आधुनिक उपकरणों में निवेश करना पड़ सकता है।

बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था को मिल सकता है लाभ

इस्पात उद्योग का विस्तार भारत की अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है। नई उत्पादन इकाइयों से निवेश और रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इसके अलावा परिवहन, निर्माण, मशीनरी और अन्य सहायक उद्योगों को भी लाभ मिलने की संभावना है।

हालांकि, नीति के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए पूंजी निवेश, कच्चे माल की उपलब्धता, ऊर्जा लागत, पर्यावरणीय नियमों और कुशल श्रमिकों की जरूरतों पर ध्यान देना होगा।

कुल मिलाकर, राष्ट्रीय इस्पात नीति-विजन 2047 का मसौदा भारत को बड़े इस्पात उत्पादक और निर्यातक देशों में अपनी स्थिति मजबूत करने की दिशा में एक दीर्घकालिक रूपरेखा प्रदान करता है। उत्पादन क्षमता, घरेलू मांग, निर्यात और स्वच्छ तकनीक से जुड़े लक्ष्य आने वाले वर्षों में इस्पात उद्योग की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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