नारियल के रेशे से भारत को ₹6,614 करोड़ का निर्यात, 7 लाख लोगों को रोजगार; महिलाएं भी बन रहीं आत्मनिर्भर

Untitled-2

भारत का नारियल फाइबर यानी कॉयर उद्योग अब पारंपरिक कारोबार से आगे बढ़कर रोजगार, निर्यात और पर्यावरण संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। नारियल के छिलकों से तैयार होने वाले रेशे का इस्तेमाल रस्सी, चटाई, गद्दे, डोरमैट और कई अन्य उपयोगी उत्पाद बनाने में किया जाता है। पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों की बढ़ती मांग ने इस उद्योग के लिए नए अवसर खोले हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत से नारियल फाइबर और उससे बने उत्पादों का निर्यात 6,614.40 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इस क्षेत्र में लाखों लोगों को आजीविका मिल रही है, जिनमें ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा कॉयर उत्पादक और निर्यातक

भारत वैश्विक स्तर पर नारियल के रेशे और उससे बने उत्पादों के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित है। वैश्विक उत्पादन में देश की हिस्सेदारी लगभग दो-तिहाई बताई जाती है। भारतीय कॉयर उद्योग का कारोबार करीब 16,000 करोड़ रुपये का है और यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा छोटे उद्योगों को मजबूती देने में अहम योगदान करता है।

नारियल के बाहरी सख्त छिलके से प्राकृतिक रेशा निकाला जाता है। इसे साफ करने, संसाधित करने और विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजारने के बाद बाजार की जरूरत के अनुसार उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इस प्रक्रिया में कृषि अवशेष का उपयोगी संसाधन के रूप में इस्तेमाल होता है और ग्रामीण क्षेत्रों में आय के नए साधन बनते हैं।

6,614 करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात

भारतीय कॉयर उद्योग के लिए वित्त वर्ष 2025-26 महत्वपूर्ण रहा। इस दौरान नारियल फाइबर और उससे बने उत्पादों का निर्यात 6,614.40 करोड़ रुपये दर्ज किया गया। अमेरिका, चीन, नीदरलैंड, स्पेन और ब्रिटेन भारतीय उत्पादों के प्रमुख विदेशी बाजारों में शामिल रहे।

नारियल का रेशा, कॉयर सूत, नारियल के रेशे से बनी चटाइयां और अन्य मूल्यवर्धित उत्पाद निर्यात में अहम स्थान रखते हैं। वित्त वर्ष 2014-15 में इन उत्पादों का निर्यात 1,630.33 करोड़ रुपये था। इसके मुकाबले 2025-26 में निर्यात 305.70 प्रतिशत बढ़ गया। यानी 12 वर्षों के दौरान निर्यात चार गुना से भी अधिक हो गया।

7 लाख से अधिक लोगों को मिल रहा रोजगार

कॉयर उद्योग की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक इसकी रोजगार पैदा करने की क्षमता है। इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 7 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिलने का अनुमान है। इनमें लगभग 80 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों की महिलाएं हैं।

नारियल फाइबर से उत्पाद बनाने की कई प्रक्रियाओं में स्थानीय कौशल और श्रम की जरूरत होती है। रेशा निकालने, सूत तैयार करने, रस्सियां बनाने, चटाई बुनने और तैयार उत्पादों की पैकिंग जैसे कार्यों से लोगों को काम मिलता है। इससे ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने और महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिलती है।

कॉयर विकास योजना से छोटे उद्योगों को सहारा

कॉयर क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए कॉयर विकास योजना के माध्यम से तकनीकी सुधार, प्रशिक्षण, बाजार विस्तार और उद्यमिता को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य पारंपरिक कामगारों और छोटे उद्योगों को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप तैयार करना है।

योजना के तहत कौशल प्रशिक्षण, नई तकनीकों के इस्तेमाल, मशीनों के विकास और उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने पर जोर दिया जाता है। इसके अलावा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय कॉयर उत्पादों की पहचान बढ़ाने के लिए व्यापार मेलों, प्रदर्शनियों और प्रचार कार्यक्रमों का सहारा लिया जाता है।

निर्यातकों की अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भागीदारी को प्रोत्साहित करने और पात्र उद्यमियों को वित्तीय सहायता देने जैसे प्रयास भी किए जा रहे हैं।

उद्यम पंजीकरण से औपचारिक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा

उद्यम पंजीकरण पोर्टल पर 21,000 से अधिक कॉयर इकाइयां पंजीकृत हैं। इन पंजीकृत इकाइयों से लगभग 2.3 लाख लोग जुड़े हुए हैं। इससे उद्योग के औपचारिक एमएसएमई क्षेत्र से जुड़ाव का पता चलता है।

प्रशिक्षण के मोर्चे पर भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से 68,000 से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया गया है, जिनमें 80 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। वहीं, 150 से अधिक नई मशीनों, तकनीकों और मूल्यवर्धित उत्पादों को विकसित करने या उपयोग में लाने की जानकारी दी गई है।

निर्यात बाजार को प्रोत्साहित करने के लिए 1,000 से अधिक निर्यातकों की अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भागीदारी सुगम बनाई गई। 850 से अधिक उद्यमियों को 20 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय सहायता मिली। इसके अलावा देशभर में 1,400 से अधिक प्रचार कार्यक्रम और 950 से अधिक प्रदर्शनियों में भागीदारी दर्ज की गई।

महाराष्ट्र की रंजना कदम ने शुरू किया अपना कारोबार

महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले की रंजना रामचंद्र कदम ने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम यानी पीएमईजीपी के तहत अपना कॉयर उद्यम स्थापित किया। कॉयर बोर्ड के मार्गदर्शन से उन्होंने इकाई शुरू करने के लिए शेड, मशीनरी और आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था की।

उनकी इकाई कॉयर रस्सियां, तकिए और डोरमैट बनाती है। इस कारोबार से छह लोगों को पूर्णकालिक रोजगार मिल रहा है। यह उदाहरण दिखाता है कि प्रशिक्षण, सही मार्गदर्शन और सरकारी योजनाओं का सहयोग मिलने पर छोटे स्तर पर भी उत्पादन इकाई स्थापित की जा सकती है।

आंध्र प्रदेश की गौथमी का कारोबार 35 लाख रुपये तक पहुंचा

आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले की अल्लम गौथमी ने कॉयर बोर्ड के प्रशिक्षण केंद्र से कौशल हासिल करने के बाद एडिगो कॉयर प्रोडक्ट्स नाम से अपना उद्यम शुरू किया। उन्हें पीएमईजीपी के तहत वित्तीय सहायता भी मिली।

आज उनकी इकाई का वार्षिक कारोबार लगभग 35 लाख रुपये बताया गया है, जबकि सालाना लाभ करीब 10 लाख रुपये है। उनके उद्यम में छह महिलाओं को रोजगार मिला है। गौथमी खुद भी प्रशिक्षण गतिविधियों से जुड़ी हैं और लगभग 120 महिलाओं को कॉयर मैट बुनाई, रस्सी निर्माण तथा हस्तशिल्प तैयार करने का प्रशिक्षण दे चुकी हैं।

केरल में कॉयर पिथ से बन रहा जैविक उर्वरक

केरल के कोझिकोड स्थित संपूर्ण प्लस एग्रो फर्टिलाइजर एंटरप्राइजेज को कॉयर बोर्ड के कार्यालय और केंद्रीय कॉयर अनुसंधान संस्थान से प्रशिक्षण एवं तकनीकी मार्गदर्शन मिला। उद्यम के संचालक सुरेंद्रन पी. ने कॉयर पिथ बायो-फर्टिलाइजर के उत्पादन और उपयोग से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लिया।

करीब एक वर्ष के भीतर इस उद्यम ने 500 से अधिक ग्राहकों का आधार तैयार किया और 20 टन से अधिक कॉयर पिथ जैव उर्वरक की बिक्री की। वर्तमान में यहां पांच श्रमिक कार्यरत हैं, जिनमें दो महिलाएं शामिल हैं। यह उदाहरण दर्शाता है कि नारियल के छिलके से प्राप्त सामग्री का इस्तेमाल पारंपरिक उत्पादों के अलावा कृषि क्षेत्र में भी किया जा सकता है।

स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के नए अवसर

केरल के अलाप्पुझा निवासी जी. साबू ने वर्ष 2024 में कॉयर कताई इकाई शुरू की। पीएमईजीपी और कॉयर बोर्ड के सहयोग से स्थापित इस इकाई ने स्थानीय कॉयर समितियों और निर्माताओं को सूत तथा रस्सी की आपूर्ति शुरू की।

इससे आसपास के गांवों के आठ से दस श्रमिकों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला, जिनमें अधिकतर महिलाएं हैं। स्थानीय स्तर पर उत्पादन और नियमित आपूर्ति से छोटे उद्यमों को बाजार से जुड़ने का अवसर मिलता है। ऐसे कारोबार ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी आजीविका विकसित करने में मददगार साबित हो सकते हैं।

विकसित भारत 2047 में कॉयर उद्योग की भूमिका

भारत का कॉयर उद्योग अब केवल रस्सी और चटाई बनाने तक सीमित नहीं है। पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों की बढ़ती मांग, तकनीकी नवाचार, कौशल विकास और निर्यात विस्तार ने इसके विकास की संभावनाओं को बढ़ाया है।

नारियल के छिलकों जैसे कृषि अवशेषों का बेहतर उपयोग संसाधनों की बर्बादी कम करने में मदद करता है। वहीं, छोटे उद्यमों को बढ़ावा मिलने से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और स्थानीय उत्पादन को मजबूती मिलती है।

यदि तकनीक, गुणवत्ता, बाजार तक पहुंच और प्रशिक्षण पर लगातार ध्यान दिया जाए, तो कॉयर उद्योग आने वाले वर्षों में भारतीय निर्यात और ग्रामीण उद्यमिता का मजबूत आधार बन सकता है। इस तरह पारंपरिक कौशल को आधुनिक कारोबार से जोड़ने वाला यह क्षेत्र 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed