भारतीय इस्पात उद्योग में जबरदस्त उछाल: खपत और उत्पादन के आंकड़ों ने तोड़े रिकॉर्ड, आयात-निर्यात में भारी तेजी

देश के औद्योगिक और बुनियादी ढांचा क्षेत्र से अर्थव्यवस्था के लिए बेहद राहत देने वाली खबर सामने आई है। चालू वित्त वर्ष के शुरुआती चार महीनों में देश के भीतर तैयार इस्पात के उत्पादन और उसकी खपत दोनों में जोरदार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अप्रैल से जुलाई की समयावधि के दौरान देश का कुल इस्पात उत्पादन करीब साढ़े चार प्रतिशत से अधिक बढ़कर साढ़े पांच करोड़ टन के आंकड़े को पार कर गया है। इस दौरान उत्पादन के मुकाबले खपत की रफ्तार ज्यादा तेज रही और यह लगभग आठ प्रतिशत बढ़कर पांच करोड़ साठ लाख टन के स्तर पर पहुँच गई। यह आंकड़े इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि देश में बुनियादी ढांचे के निर्माण, ऑटोमोबाइल और विनिर्माण क्षेत्र में भारी मांग बनी हुई है जो घरेलू बाजार को लगातार मजबूती प्रदान कर रही है।
केवल जुलाई महीने की स्थिति पर नजर डालें तो इस दौरान भी बाजार में बेहतर हलचल देखी गई। पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में इस साल जुलाई में तैयार इस्पात का उत्पादन लगभग चार प्रतिशत बढ़कर एक करोड़ चालीस लाख टन रहा। वहीं अगर मांग की बात करें तो जुलाई महीने में खपत लगभग पौने सात प्रतिशत की वृद्धि के साथ एक करोड़ चौवालीस लाख टन के आंकड़े तक पहुँच गई। घरेलू बाजार में बढ़ती मांग के कारण देश के भीतर व्यापार गतिविधियों में भी तेजी आई है और आयात व निर्यात दोनों के आंकड़ों में बड़ा उछाल देखा गया है।
चार महीनों की इस अवधि में इस्पात का आयात लगभग सैंतीस प्रतिशत बढ़कर करीब अट्ठाईस लाख टन पहुँच गया, वहीं दूसरी ओर निर्यात में भी पैंतीस प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह तेजी से बढ़कर तेईस लाख टन के करीब पहुँच गया। व्यापार की मात्रा और मौद्रिक मूल्य दोनों ही दृष्टिकोण से इस अवधि में देश इस्पात का शुद्ध आयातक बना रहा। आयातित इस्पात का कुल मूल्य बयालीस प्रतिशत से अधिक बढ़कर अठ्ठाईस हजार करोड़ रुपये से अधिक रहा, जबकि देश से बाहर भेजे गए इस्पात का निर्यात मूल्य उनतीस प्रतिशत बढ़कर लगभग अठारह हजार करोड़ रुपये दर्ज किया गया।
अगर अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला की बात करें तो देश में इस्पात आपूर्ति के मामले में पड़ोसी देश सबसे बड़ा साझेदार बनकर उभरा है। कुल आयातित इस्पात में से लगभग एक तिहाई हिस्सा अकेले एक ही देश से आया है, जबकि उसके बाद पूर्वी एशियाई देशों की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही है। दूसरी तरफ भारतीय इस्पात के लिए दक्षिण-पूर्व एशियाई बाजार सबसे बड़ा खरीदार साबित हुआ है, जिसके बाद खाड़ी देशों ने भी भारतीय इस्पात की खरीद में गहरी रुचि दिखाई है।
विशेष प्रकार के इस्पात श्रेणी में अलॉय स्टील का प्रदर्शन काफी शानदार रहा है। इसके उत्पादन में लगभग सत्ताईस प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी देखी गई है, जबकि इसकी खपत में भी बाईस प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है। सबसे चौंकाने वाला उछाल इसके निर्यात में देखने को मिला, जो डेढ़ सौ प्रतिशत से भी अधिक की रफ्तार से बढ़कर एक लाख बाईस हजार टन के स्तर को पार कर गया। इसके विपरीत स्टेनलेस स्टील के उत्पादन में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई, हालांकि इसकी घरेलू खपत में पच्चीस प्रतिशत की मजबूत वृद्धि देखी गई जो इस क्षेत्र में मांग के बने रहने का संकेत देती है।
औद्योगिक नीति और भावी संभावनाओं के मोर्चे पर भी बड़े कदम उठाए जा रहे हैं। हाल ही में खनन कानूनों में किए गए संशोधनों से इस्पात उद्योग को लगने वाले कच्चे माल की उपलब्धता आसान होने की उम्मीद जताई जा रही है। इससे खनन क्षेत्र में नए निवेश का रास्ता साफ होगा और लौह अयस्क जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति बाधित नहीं होगी। इसके अतिरिक्त उद्योग में आधुनिक तकनीकों और पर्यावरण के अनुकूल प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए भी प्रयास तेज कर दिए गए हैं। देश की कई प्रमुख उत्पादक इकाइयों को पर्यावरण के अनुकूल उत्पादन के लिए उच्च स्तरीय रेटिंग वाले प्रमाणपत्र भी दिए जा चुके हैं जो इस उद्योग को भविष्य के लिए अधिक टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बनाएंगे।
