फाल्गुन पूर्णिमा पर महाकाल मंदिर में विशेष होलिका दहन, बदलेगा आरती का समय
फाल्गुन मास की पूर्णिमा के अवसर पर देशभर में होलिका दहन की तैयारियां जोरों पर हैं, लेकिन परंपरा के अनुसार इसकी शुरुआत सबसे पहले मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध Mahakaleshwar Jyotirlinga मंदिर से होती है। वर्षों से चली आ रही इस धार्मिक परंपरा के तहत देश में हर बड़ा पर्व सबसे पहले बाबा महाकाल की नगरी में मनाया जाता है और उसके बाद अन्य स्थानों पर उत्सव की शुरुआत होती है।
सोमवार शाम संध्या आरती के दौरान मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी। आरती के समय भगवान महाकाल को प्रतीकात्मक रूप से गुलाल अर्पित किया जाएगा। इसके बाद शाम करीब साढ़े सात बजे वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मंदिर परिसर में गोबर के उपलों से तैयार की गई होलिका का दहन किया जाएगा। यह आयोजन पूरी धार्मिक विधि-विधान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न होगा।
मंदिर के पुजारियों के अनुसार महाकाल मंदिर में होली का पर्व मनाने की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। इस परंपरा के तहत भगवान को प्रतीकात्मक रूप से गुलाल अर्पित किया जाता है, जिससे उत्सव का शुभारंभ माना जाता है। इस वर्ष भी भगवान महाकाल को केवल एक किलो हर्बल गुलाल अर्पित किया जाएगा। यह निर्णय मंदिर की परंपरा और मर्यादा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
सुरक्षा की दृष्टि से मंदिर प्रशासन ने विशेष इंतजाम किए हैं। श्रद्धालुओं को होलिका दहन स्थल के पास जाने की अनुमति नहीं होगी। पूर्व में आग की एक घटना को देखते हुए प्रशासन ने एहतियात के तौर पर यह कदम उठाया है। आयोजन के दौरान संभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहेंगे और संपूर्ण व्यवस्था पर नजर रखेंगे। मंदिर परिसर में रंग-गुलाल लेकर प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। यहां तक कि पुजारी, कर्मचारी और सुरक्षाकर्मी भी रंग लेकर प्रवेश नहीं करेंगे। सभी प्रवेश द्वारों पर सघन जांच की जाएगी और पूरे परिसर की निगरानी सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से की जाएगी।
मंदिर समिति के अनुसार धुलेंडी का पर्व अगले दिन मनाया जाएगा। तड़के सुबह होने वाली भस्म आरती में सबसे पहले भगवान महाकाल को गुलाल अर्पित किया जाएगा। इसके बाद भांग और चंदन से विशेष श्रृंगार किया जाएगा। ग्रहण के सूतक काल में मंदिर के पट खुले रहेंगे, हालांकि नियमित भोग नहीं लगाया जाएगा और भगवान को केवल शक्कर का भोग अर्पित किया जाएगा। ग्रहण समाप्त होने के बाद मंदिर की शुद्धि की जाएगी और फिर विधिवत पूजा-अर्चना एवं आरती संपन्न होगी।
होलिका दहन के अगले दिन से भगवान महाकाल की दैनिक दिनचर्या में भी बदलाव शुरू हो जाएगा। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से गर्मी के अनुसार आरती का समय निर्धारित किया जाता है। इस दिन से बाबा महाकाल को ठंडे जल से स्नान कराने की परंपरा शुरू हो जाती है, जो शरद पूर्णिमा तक जारी रहती है।
नए समय के अनुसार भस्म आरती प्रातः चार बजे से छह बजे तक होगी। दद्योदक आरती सुबह सात बजे से साढ़े सात बजे तक और भोग आरती सुबह दस बजे से साढ़े दस बजे तक निर्धारित है। संध्या पूजन शाम पांच बजे से पौने छह बजे तक, संध्या आरती सात बजे से पौने आठ बजे तक और शयन आरती रात्रि साढ़े दस बजे से ग्यारह बजे तक संपन्न होगी।
मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि होली का पर्व मंदिर की गरिमा और पवित्रता को ध्यान में रखते हुए शांति और श्रद्धा के साथ मनाएं।
