भारतीय रेलवे का ऐतिहासिक कारनामा, JNPT से वडोदरा तक दौड़ी देश की पहली डबल-स्टैक लॉन्ग-हॉल ट्रेन

भारतीय रेलवे ने देश के माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में एक नया इतिहास रचते हुए एक बड़ी सफलता हासिल की है। मुंबई के पास स्थित जवाहरलाल नेहरू पोर्ट से वडोदरा मंडल के वरणामा स्थित जीसीटी टर्मिनल तक पहली डबल-स्टैक लॉन्ग-हॉल कंटेनर ट्रेन का सफल संचालन किया गया। वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के समर्पित ट्रैक पर दौड़ने वाली इस ट्रेन ने लगभग 422 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 360 टीईयू कंटेनरों को एक साथ ढोया। यह उपलब्धि एक ही रेल यात्रा में कंटेनर माल ढुलाई क्षमता को दोगुना करने और बंदरगाहों से देश के अंदरूनी हिस्सों तक माल पहुंचाने की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव मानी जा रही है।
इस विशेष लॉन्ग-हॉल ट्रेन का निर्माण दो अलग-अलग डबल-स्टैक रैक को आपस में जोड़कर किया गया था। ट्रेन के आगे वाले हिस्से में लगे रैक को एक शक्तिशाली लोकोमोटिव खींच रहा था, जिसका कुल वजन 1,817 टन था और इसमें 180 कंटेनर लदे हुए थे। वहीं, इसके पीछे जुड़े दूसरे रैक को एक अन्य लोकोमोटिव द्वारा संचालित किया गया, जिसका कुल वजन 2,105 टन था और उसमें भी 180 कंटेनर रखे गए थे। इस प्रकार दोनों रैक को मिलाकर एक ही समय में कुल 360 टीईयू कंटेनरों की निर्बाध आवाजाही संभव हो सकी, जिसने भारतीय रेल की लॉजिस्टिक्स क्षमता का लोहा मनवाया है।
इस नई व्यवस्था का प्राथमिक उद्देश्य प्रमुख बंदरगाहों और लॉजिस्टिक्स टर्मिनलों से माल की निकासी को बेहद तेज, सुगम और अधिक प्रभावी बनाना है। एक ही ट्रेन में इतनी बड़ी मात्रा में माल ले जाने से बंदरगाहों और टर्मिनलों पर लगने वाले लंबे जाम और भीड़-भाड़ की समस्या से निजात मिलेगी, जिससे व्यापारियों के कंटेनरों को लंबे समय तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, रेलवे की इस बढ़ी हुई वहन क्षमता के कारण समान मात्रा में सामान ढोने के लिए कम रेल डिब्बों और पटरियों की जरूरत होगी, जिससे उपलब्ध रेल मार्ग क्षमता का अधिक कुशल और बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो सकेगा।
इस सफल पहल का सीधा और सकारात्मक प्रभाव देश के सड़क परिवहन और पर्यावरण पर भी देखने को मिलेगा। चूंकि यह पूरी मालगाड़ी शत-प्रतिशत बिजली से संचालित हुई, इससे डीजल आधारित भारी ट्रकों पर निर्भरता काफी हद तक कम हो जाएगी। एक ही ट्रेन के माध्यम से सैकड़ों ट्रकों के बराबर माल एक बार में पहुंचाए जाने से सड़कों पर यातायात का दबाव कम होगा, ईंधन की भारी बचत होगी और वाहनों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन व प्रदूषण को नियंत्रित करने में बड़ी मदद मिलेगी। यह प्रयोग साबित करता है कि बंदरगाहों को देश के आंतरिक हिस्सों से जोड़ने के लिए रेल-आधारित फ्रेट कॉरिडोर एक रीढ़ की हड्डी के रूप में उभर रहा है।
