सुप्रीम कोर्ट में लावारिस कुत्तों का मुद्दा, स्टरलाइजेशन व्यवस्था पर उठे सवाल

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सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को लावारिस कुत्तों की बढ़ती समस्या को लेकर सुनवाई हुई, जिसमें एक याचिकाकर्ता ने अपने इलाके की स्थिति बताते हुए कहा कि बड़ी संख्या में आवारा कुत्ते पूरी रात आपस में दौड़ते और भौंकते रहते हैं। इससे न केवल उनकी नींद खराब होती है, बल्कि बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि इस समस्या को लेकर उन्होंने स्थानीय अधिकारियों से कई बार शिकायत की, लेकिन हर बार यही जवाब मिला कि प्रशासन केवल वैक्सीनेशन और स्टरलाइजेशन तक ही सीमित है।

याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि उन्होंने इस मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचाया, लेकिन वहां से भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उनके वकील ने दलील दी कि एनिमल बर्थ कंट्रोल नियमों का दायरा सीमित है, जिसके तहत कुत्तों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद फिर उसी इलाके में छोड़ दिया जाता है, जिससे जमीनी समस्या जस की तस बनी रहती है।

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत में कहा कि दुनिया भर में यह माना जाता है कि लावारिस कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए प्रभावी और व्यवस्थित स्टरलाइजेशन जरूरी है। उन्होंने जयपुर और गोवा का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां यह मॉडल काफी हद तक सफल रहा है, लेकिन देश के अधिकांश शहरों में नसबंदी कार्यक्रम सही तरीके से लागू नहीं हो पा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि स्टरलाइजेशन से कुत्तों की आक्रामकता कम होती है, लेकिन जब प्रक्रिया पारदर्शी और जवाबदेह नहीं होती, तो उसका अपेक्षित असर नहीं दिखता।

प्रशांत भूषण ने सुझाव दिया कि एक ऐसा सिस्टम बनाया जाना चाहिए, जिसमें लोग उन लावारिस कुत्तों की शिकायत कर सकें जिनका स्टरलाइजेशन नहीं हुआ है। यह जानकारी किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या वेबसाइट पर दर्ज की जाए और एक विशेष प्राधिकरण हो जो ऐसी शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई सुनिश्चित करे।

इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने टिप्पणी करते हुए कहा कि फिर तो हमें कुत्तों से ही सर्टिफिकेट लेकर चलने को कहना पड़ेगा। इस पर प्रशांत भूषण ने आपत्ति जताते हुए कहा कि कोर्ट की ऐसी टिप्पणियां गलत संदेश दे सकती हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पहले भी कोर्ट की ओर से यह कहा गया था कि कुत्तों के काटने के मामलों में फीडर्स को जिम्मेदार ठहराया जाए, जिसे कई लोगों ने व्यंग्य के रूप में लिया। इस पर जस्टिस विक्रम नाथ ने स्पष्ट किया कि वह टिप्पणी व्यंग्य में नहीं, बल्कि पूरी गंभीरता से की गई थी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट और पूर्व केंद्रीय मंत्री द्वारा इस मामले पर किए गए एक पॉडकास्ट पर भी नाराजगी जताई। पूर्व मंत्री की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन से कोर्ट ने कहा कि अभी कुछ देर पहले आप कोर्ट की टिप्पणियों को लेकर सावधानी बरतने की बात कर रहे थे, लेकिन क्या आपको पता है कि आपकी क्लाइंट सार्वजनिक मंच पर किस तरह की बातें कर रही हैं। कोर्ट ने कहा कि यह आचरण अवमानना के दायरे में आ सकता है, हालांकि फिलहाल इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या वकील ने अपनी क्लाइंट का पॉडकास्ट सुना है और उनकी भाषा, हावभाव और कोर्ट को लेकर की गई टिप्पणियों को समझा है।

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